Responsive Menu
Add more content here...
April 13, 2026
ब्रेकिंग न्यूज

Sign in

Sign up

ऐसे तो ‘साफ’ हो जाएगी सपा !

By Shakti Prakash Shrivastva on July 18, 2023
0 416 Views

शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

                               उत्तर प्रदेश में निःसन्देह समाजवादी पार्टी इकलौती ऐसी समर्थ पार्टी है जो बीजेपी की आँख में आँख डालकर सियासत कर रही है। चूंकि यूपी देश का इकलौता ऐसा प्रदेश है जहां से सर्वाधिक अस्सी लोकसभा सीटें हैं। इसलिए बीजेपी विरोधी या विपक्षी एकता की जब-जब कोई बात होती है तो समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव को वहाँ तवज्जो मिलती है। अभी बीजेपी को लोकसभा चुनाव में शिकस्त देने के एजेंडे के साथ 23 जून को पटना में हुई विपक्षी दलों की बैठक में भी अखिलेश को खासा सम्मान मिला। लेकिन बाहर जहां अन्य दलों के बीच सपा मजबूत दिख रही है उसे सम्मान भी मिल रहा है लेकिन प्रदेश के अंदर की सियासत में सपा लगातार कमजोर होते दिख रही है। एक-एक कर उसके सियासी साथी साथ छोड़ रहे हैं लेकिन उनके अलग होने की स्थिति में उनके मान-मनौवल या उन्हे रोकने की कोई अखिलेश यादव की तरफ से नहीं किया जा रहा है। ऐसे ही चलता रहा तो कमजोर होते-होते एक दिन पार्टी ही साफ हो जाएगी और लोकसभा चुनाव के मद्देनजर दिया गया अखिलेश का सियासी पिछड़ा,दलित और अल्पसंख्यक वाला समीकरण पीडीए भी अप्रभावी साबित हो जाएगा। लगातार ऐसा देखा जा रहा है खासकर विधानसभा चुनाव के बाद से कि पार्टी के सहयोगी छोटे-छोटे दल पार्टी की नीतियों से नाराज हो एक-एक कर साथ छोड़ते जा रहे हैं। लेकिन पार्टी की तरफ से उन्हे साथ रहने के लिए आवश्यक विश्वास दिलाने का कोई प्रयास भी नहीं हो रहा है। पार्टी का यह व्यवहार समझ से परे है।

असल में हुआ ये कि चुनाव पूर्व गठबंधन सहयोगियों से किए गए वादों के मुताबिक सहयोगियों को वाजिब हिस्सेदारी नही दी गई। इस पर उनमे धीरे-धीरे असंतोष बढ़ता गया। जो सुभासपा सुप्रीमो ओमप्रकाश राजभर के एनडीए के साथ चले जाने पर पूरी तरह उजागर हो गया। समय रहते यदि स्थितियों को नियंत्रित करने के प्रयास किए गए होते तो शायद हालात ऐसे न होते। विधानसभा चुनाव से पहले महान दल, सुभासपा और रालोद का सपा के साथ गठबंधन के अलावा योगी सरकार के तीन कद्दावर मंत्री दारा सिंह चौहान, स्वामी प्रसाद मौर्य और धर्म सिंह सैनी बीजेपी छोड़ सपा में शामिल हुए थे। चुनाव में सुभासपा के 6 और रालोद के 8 विधायक जीतकर आए। हालांकि गठबंधन के तहत इन दोनों पार्टियों को क्रमशः 18 और 33 सीटों पर चुनाव लड़ने का मौका मिला था। विधानसभा चुनाव के ठीक बाद मई महीने में हुए राज्यसभा चुनाव में सुभासपा सुप्रीमो ओमप्रकाश राजभर ने राज्यसभा की एक सीट मांगी थी लेकिन पार्टी ने उनकी मांग पर कोई संज्ञान नहीं लिया। सपा हाइकमान ने उन्हें न तो सीट दी और न ही भविष्य के लिए कोई आश्वासन ही दिया। इस पर अपने को अपमानित महसूस करते हुए धीरे-धीरे राजभर सपा से किनारा करने लगे। इसके बाद जब जयंत चौधरी को राज्यसभा भेजने का निर्णय पार्टी ने लिया तो राजभर अखिलेश पर बिफर पड़े। उनका मानना था कि विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की जीत का स्ट्राइक रेट रालोद से बेहतर होने के बावजूद उनको तवज्जो नहीं दी गई।

राज्यसभा चुनाव के बाद ही जून-जुलाई में जब विधान परिषद के चुनाव हुए। उस समय भी ओमप्रकाश राजभर ने अपने परिवार के लिए और महान दल के केशव देव मौर्य ने खुद के लिए एक सीट मांगी। ऐसे में जबकि सपा के पास विधान परिषद में अपने चार उम्मीदवार जिताने लायक समीकरण थे। इसके बावजूद  सपा ने राजभर के प्रस्ताव को दुबारा भी कोई अहमियत नहीं दी। राजभर की तरह का ही व्यवहार महान दल सुप्रीमो केशव देव मौर्य के साथ भी हुआ। दोनों नेताओं में आक्रोश था ही लेकिन जैसे ही स्वामी प्रसाद मौर्य को विधान परिषद में भेजने के निर्णय की उन्हें जानकारी मिली। केशव देव मौर्य ने गठबंधन से अलग होने का एलान कर दिया। सपा हाइकमान ने केशव देव को मनाने की बजाय चुनाव प्रचार के लिए उन्हे दी गई गाड़ी वापस ले ली। इसके बाद ओमप्रकाश राजभर ने भी सपा गठबंधन को लेकर बगावती रुख अख्तियार कर लिया और अंततः रविवार को बीजेपी गठबंधन की शरण ले ली। ऐसे में जहां एक तरफ लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हराने के लिए आपसी मतभेद भुला सारी विपक्षी पार्टियां एक हो रही है। एका के लिए बैठके कर रही है जिनमे सपा सुप्रीमो भी मौजूद रह रहे है। दूसरी तरफ प्रदेश में गठबंधन के सहयोगी एक-एक कर अलग हो रहे हैं। भले ही सपा सुप्रीमो इसे किन्ही वजहों से हल्के में ले रहे है लेकिन ये भविष्य में उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है।

 

 

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *