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अब तो ‘चाचा’ की कीमत समझें अखिलेश

By Shakti Prakash Shrivastva on September 12, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

               उत्तर प्रदेश की घोसी विधानसभा का प्रतिष्ठापरक उपचुनाव सपा जीत चुकी है। इस चुनाव को इसलिए प्रतिष्ठापरक कहा गया क्योंकि इसे सत्तारूढ़ दल ने ऐसा बना दिया। सरकार के कद्दावर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत दोनों मुख्यमंत्रियों, दर्जनों मंत्रियों, कई दर्जन विधायकों और कई दर्जन सहयोगी दलों के दिग्गजों की चुनावभर यहाँ लगातार आवाजाही बनी रही। कुछ तो यहाँ चुनावभरडेरा डाले रहे। ऐसे माहौल ने इस चुनाव को आम से खास बना दिया था। इसके अलावा पूरी सरकारी मशीनरी के अघोषित सहयोग के बावजूद एक बड़े वोटों के अंतर से हुई सपा की जीत का गणित समझनाआमजन की सोच से परे था। लेकिन जिन लोगों को सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल की सियासी दक्षता का तनिक भी एहसास है वो जानते है कि ये पूरी बाजी जीतना शिवपाल की सियासी कौशल और सांगठनिक कार्य दक्षता की देन है। इस बम्पर जीत ने न केवल सपा को मजबूत किया है बल्कि नवगठित विपक्षी गठबंधन आईएनडीए के लिए ये बूस्टर डोज़ भी साबित हुआ है। ऐसे में अब सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को यह समझना होगा कि चाचा शिवपाल की कीमत क्या है और उन्हे आने वाले दिनों में कैसे और प्रभावी व परिणामपरक बनाया जा सकता है।

घोसी जीतने के बाद पहली बार शिवपाल यादव ने अखिलेश यादव जिंदाबाद का नारा लगाया। जो जाहिर करता है कि शिवपाल ने अखिलेश के नेतृत्व को अब पूरी तरह स्वीकार कर लिया है। अब अखिलेश को भी चाचा के इस भाव को समझना होगा। हालांकि मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव में रिकार्ड जीत के बाद अखिलेश ने चाचा शिवपाल को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाया था। पार्टी सूत्रों से मिली जानकारी की मुताबिक निकट भविष्य में शिवपाल के कद और बढ्ने की उम्मीद है। पहले चाहे कुछ भी रहा हो लेकिन मैनपुरी चुनाव के बाद से शिवपाल यादव ने अखिलेश यादव को न केवल भाव से अपना मान लिया है बल्कि उनका नेतृत्व भी स्वीकार लिया है। यही वजह है कि उन्होने उसी समय अपनी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी काभीसपा में विलय कर दिया था। इतना ही नहीं अखिलेश ने इसके बादजिस उपचुनाव की कमान शिवपाल को थमाई उसमें पार्टी विजयी रही।2022 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश में लोकसभा के 3 उपचुनाव हुए। इनमें मैनपुरी को छोड़ देतो आजमगढ़ और रामपुर में शिवपाल प्रचार करने नहीं गए थे। वहां पार्टी का क्या हुआ? यह सब को पता है। जबकि मैनपुरी चुनाव के बीच ही शिवपाल ने कमान संभालीऔर डिंपल यादव रिकॉर्ड मतों से विजयी हुईं। इसकेअलावा प्रदेश में विधानसभा के गोला, रामपुर, छानबे,स्वार या खतौली का उपचुनावहुआ लेकिन किसी में भी शिवपाल प्रचार करने नहीं गए। इनमें सिर्फ खतौली एकमात्र सीट थी जहां सपा का गठबंधन राष्ट्रीय लोकदल काउम्मीदवार जीता था।

पिछले दिनों जब सपा विधायक दारा सिंह चौहान के इस्तीफे से रिक्त हुई घोसी सीट पर विधानसभा का उपचुनाव हुआ तो पार्टी ने यहाँ के चुनाव की जिम्मेदारी शिवपाल यादव को दी। नतीजा सबके सामने है कि घोसी में सपा 2022 के मुकाबले लगभग दोगुनी वोटों से जीती। प्रदेश सरकार के मंत्रियों-विधायकों की लंबी-चौड़ी फौज पर शिवपाल पूरी तरह भारी पड़े। सियासी जानकारों की माने तो शिवपाल ने घोसी चुनाव प्रचार में मुलायम सिंह का चर्चित चरखा दांव चला था। यह ऐसा दांव है जिसमें अचानक विरोधी चित हो जाते हैं। घोसी में शिवपाल ने वहां राजभर के एक वक्त में करीबी रहे महेंद्र राजभर को अपने साथ कर लिया। चुनावी चक्रव्यूह को विधिवत समझने वाले शिवपाल ने घोसी में एक-एक कार्यकर्ता के दरवाजे तक जा कर कार्यकर्ताओं को घर से बाहर निकालने तक का काम किया। यही वजह रहा कि मतगणना में पहले राउंड से लेकर आखिरी तक सपा के सुधाकर सिंह आगे रहे। दारा सिर्फ चुनाव जीतकर मंत्री बनने के लिए बीजेपी में गए यह जनता को बताने में भी शिवपाल कामयाब रहे। दारा सिंह चौहान को टिकट दिए जाने से बीजेपी के कार्यकर्ता और स्थानीय नेताओं में भी नाराजगी थी। वजह थी कि वो वह बार-बार पार्टी बदल रहे हैं। भले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सहित बड़े नेताओं ने घोसी में कैंप किया लेकिन पार्टी की स्थानीय लीडरशिप दारा को स्वीकार नहीं कर पाई। इसलिए, उन्होंने अंदर खाने में विरोध करने वाले नेताओं को भी जोड़ लिया।

लोकसभा चुनाव 2024 के पहले सुभासपा के भरोसे पूर्वांचल की नैया पार करने की फिराक में लगी बीजेपी को शिवपाल के व्यूह रचना के चलते घोसी की जनता ने बड़ा झटका दिया।गठबंधन की पहली ही परीक्षा में राजभर को मात दे दी शिवपाल ने। इसके अलावा शिवपाल ने जनता में दारा सिंह चौहान की छवि एक दलबदलू और मौका परस्त नेता के रूप में स्थापित करने में भी शिवपाल सफल रहे। शिवपाल आज भले सपा के लिए जीत की राह तैयार कर रहे हो, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में एक वक्त ऐसा भी था। जब शिवपाल की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी ही सपा के सामने चुनौती पेश कर रही थी। खासतौर से सपा का गढ़ माने जाने वाले कुछ लोकसभा सीटों पर तो प्रसपा ने सपा को सीधी चुनौती दी थी। देर से ही सही अखिलेश को चचा शिवपाल की अहमियत अब समझ में आने लगी है। समझना भी चाहिए क्योंकि अखिलेश को अगर पार्टी को राष्ट्रीय फलक तक पहुंचाना है तो उन्हे शिवपाल को यूँ ही साधे रखना होगा।

 

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