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सीमांचल की सीमा तय करेगा AIMIM

By Shakti Prakash Shrivastva on November 8, 2025
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                                                                                        शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

बिहार विधानसभा के पहले चरण का मतदान छः नवंबर को होना है। इसके लिए चुनाव प्रचार थम चुका है। डोर टू डोर प्रचार का दौर जारी है। सीमांचल के इलाके के अलावा पूरे बिहार में  एनडीए और आइएनडीआइए गठबंधनों के अलावा जनसुराज और एआईएमआईएम जैसी पार्टियां भी एक-एक सीट के लिए मंथन कर रही हैं। सीमांचल की चौबीस विधानसभा सीटों के लिए भी दोनों गठबंधनों के पुरोधा पूरी जोर आजमाइश कर रहे है। लेकिन सीमांचल की सच्चाई ये है कि यहाँ की पूरी सियासी गुणा-गणित एआईएमआईएम पर निर्भर है।

यही वजह है कि इन सबके बीच सीमांचल की 24 सीटों पर एनडीए और आइएनडीआइए गठबंधनों की खास नजर है। यहाँ दोनों ही गठबंधनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। 2020 के विधानसभा चुनाव में सीमांचल के अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार जिले के सभी 24 विधानसभा सीटों पर एनडीए ने 12 और आइएनडीआइए गठबंधन ने जहां 7 विधानसभा सीटों पर परचम लहराया था वहीं अकेले एआईएमआईएम ने 5 सीटें जीतकर सीमांचल की सियासत में एक नई इबारत लिखी थी।
इसमें सर्वाधिक नुकसान आइएनडीआइए गठबंधन को उठाना पड़ा था। वो भी तब जब पाँच चरणों में चुनाव होने की वजह से आइएनडीआइए गठबंधन को आशातीत सफलता की उम्मीद थी। लेकिन उस पर एआईएमआईएम ने पानी फेर दिया था। एआईएमआईएम के सभी जीते छः सीटों में पाँच इसी इलाके की थीं। इनमें एआईएमआईएम को अररिया में जोकीहाट और किशनगंज में बहादुरगंज, ठाकुरगंज, कोचाधामन, अमौर और बायसी विधानसभा सीटों पर कामयाबी मिली थी।

हालांकि बाद में राजद ने इस पार्टी में सेंध लगाते हुए पहले जोकीहाट के एआईएमआईएम विधायक शाहनवाज आलम को विश्वास में लिया और उसके माध्यम से चार विधायकों को तोड़   सभी पांच विधायकों को राजद में शामिल कर लिया। चूंकि सीमांचल का इलाका राजद और कांग्रेस का गढ़ रहा है। कभी यहा पूर्व केंद्रीय मंत्री तस्लीमुद्दीन का साम्राज्य माना जाता था। सही मायने में यहाँ राजद की बादशाहत थी। लेकिन एआईएमआईएम की सेंधमारी ने राजद और कांग्रेस के इस किले को ध्वस्त कर दिया। जिसे इस बार आइएनडीआइए गठबंधन फिर से वापस पाने के लिए अपनी एडी चोटी एक कर दिया है। पिछले चुनाव में सीमांचल के चार जिलों में तीन जिलों में एनडीए एक नंबर पर रहा था। किशनगंज ही एकमात्र ऐसा जिला रहा जहां एनडीए का खाता नहीं खुला था।
यही वजह है कि स्थिति का आकलन करने के बाद असदुद्दीन ओवैसी को एहसास हुआ कि सियासी जमीन वापसी के लिए उन्हे भी कुछ करना होगा। इस क्रम में पिछले दिनों अपने चार दिवसीय दौरे पर उन्होंने सीमांचल में ताबड़तोड़ दर्जनों स्थानों पर सभा कर वोटरों की गोलबंदी की है। अब देखना ये है कि क्या ओवैसी इस बार अपना पिछला करिश्मा दोहरा पाएंगे या नहीं। इसके लिए 14 नवंबर तक का इंतजार करना होगा।

 

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