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विलुप्त होते जज़्बाती संस्कारों को सँजोने का पैगाम दे गया ‘जश्न-ए-उर्दू’

By Shakti Prakash Shrivastva on September 11, 2023
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                  गोरखपुर,(संवाददाता)। गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए देश-दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाला शहर-ए-गोरखपुर हिन्दी-उर्दू साहित्य के समृद्ध विरासत के लिए भी जाना जाता है। यहाँ फ़िराक़ गोरखपुरी, मजनू गोरखपुरी और मुंशी प्रेमचंद सरीखे साहित्यिक शख़्सियतों का जुड़ाव रहा है। उर्दू ज़ुबान ओ अदब की बेहतरी और बालिकाओं की तालीम के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाली एक अज़ीम शख़्सियत मो. हामिद अली के रूप में भी यहाँ रही है। साहित्य और समाज के प्रति उनके समर्पण भाव से आज की मौजूदा नई पीढ़ी को परिचित कराने के उद्देश्य से महानगर में तीन दिवसीय जश्न-ए-उर्दू कार्यक्रम का आयोजन किया गया। उर्दू साहित्य प्रकाशन, उर्दू साहित्य से संबंधित प्रतियोगितात्मक क्रिया-कलापों के साथ-साथ उर्दू जुबान ओ अदब और सामाजिक सद्भाव स्थापना को समर्पित एक से बढ़कर एक कार्यक्रम इन तीन दिनों में किये गए। लेकिन इस तीन दिवसीय जश्न-ए-उर्दू कार्यक्रम में एक अलग संदेश ध्वनित हुआ जिसकी आज के समाज से विलुप्त हो रहे संस्कारों को बचाने में अहम योगदान है। वो है पूर्वजों की समाजोपयोगी थाती को सँजोये रखते हुए उसे आयोजन के माध्यम से समाज के भावी पीढ़ी के लिए प्रस्तुत करना। इसके लिए आयोजक संस्था, साजिद अली मेमोरियल कमेटी की जितनी प्रशंसा की जाए कम है।
महबूब सईद ‘हारिस’ के संयोजन और मो. फर्रूख जमाल के संचालन में सम्पन्न हुए इस सफल जश्न-ए-उर्दू कार्यक्रम का मुख्य आयोजन बख्शीपुर स्थित एम.एस.आई इंटर कालेज के सभागार में किया गया। कार्यक्रम का आगाज़ शनिवार को घासीकटरा स्थित मो. हामिद अली हाल मे डॉ. सलाम संदेलवी की किताब “तारीख़-ए-अदबियात-ए-गोरखपुर ” के दूसरे संस्‍करण के विमोचन के साथ हुआ। विमोचन करते हुए बतौर मुख्य अतिथि यूपी उर्दू एकेडमी के चेयरमैन चौधरी कैफुलवरा ने कहा कि यह उर्दू भाषा का ही जादू है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लोग इससे मोहब्बत कर रहे हैं।
आयोजन के दूसरे दिन रविवार को एम.एस.आई इंटर कॉलेज बक्शीपुर के सभागार में ‘मोहम्मद हामिद अली एक ख़ादिम-ए-उर्दू’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया। परिचर्चा में मशहूर शायर वासिफ़ फारुक़ी और आजमगढ़ के प्रतिष्ठित शिब्ली नेशनल पीजी कॉलेज से इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. अलाउद्दीन ख़ान को सम्मानित किया गया।

परिचर्चा को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए डॉ. अलाउद्दीन ख़ान ने कहा कि उर्दू भाषा का भविष्य उज्जवल है। इस भाषा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। आज के युग में टेक्नोलाजी और सांइस के प्रगति करने से उर्दू के लिए साइबर व डिजिटल दुनिया में रास्ते बहुत आसान हो गए हैं। मोहम्मद हामिद अली साहब ने उर्दू के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अध्यक्षता करते हुए वासिफ़ फारूक़ी ने कहा कि उन्हें खुशी है कि इल्मो अदब की जमीं गोरखपुर से उर्दू की तरक़्क़ी के लिए सराहनीय काम किया जा रहा है। शहर के अतीत और इसकी तहज़ीब की बात हो रही है तो इस समय मुझे एक बेहद दिलचस्प शख्सियत मोहम्मद हामिद अली की याद आ रही है। वह बस इस चाहत के साथ जीते रहे कि उर्दू पढ़ी जाए, उर्दू लिखी जाए, उर्दू बोली जाए। मेरे नजदीक उर्दू के ख़िदमतगारों में वो एक बुलंद दर्जे के मालिक थे। मगहर स्थित दुनिया के इकलौते गुरुद्वारा भगत कबीरजी की प्रशासक बीबी परमजीत कौर ‘राना’ ने कहा कि उर्दू अदब की तरक़्क़ी के लिए गोरखपुर अहम भूमिका निभा रहा है। मोहम्मद हामिद अली ने उर्दू के विकास में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डॉ. सौरभ पांडेय ने कहा कि उर्दू भाषा में जोड़ने की क्षमता मौजूद है। इस भाषा ने हमेशा परिवर्तन का स्वागत किया है और क्षेत्रीय सीमा, वर्ण, जाति एवं धर्म से ऊपर उठ कर राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने का काम किया है।
कमेटी के सचिव महबूब सईद हारिस ने कहा कि उर्दू का विकास तहज़ीब का विकास है और इसकी तरक़्क़ी और विस्तार के लिए ज़रूरी है कि नई नस्लों तक उर्दू का पैग़ाम पहुंचाया जाए ।
जश्न-ए-उर्दू कार्यक्रम के अंतिम दिन सोमवार को बक्शीपुर स्थित मुख्य कार्यक्रम स्थल पर अफ़साना लेखन प्रतियोगिता में भाग लेने वाले छात्र-छात्राओं एवं नगर के कुछ वरिष्ठ अफसाना निगारों को पुरस्कृत किया गया। इस दौरान उर्दू की तरक़्क़ी के लिए संवाद भी हुआ।
संवाद में बतौर मुख्य अतिथि गोविवि के विधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. नसीम अहमद ने कहा कि उर्दू हिंदुस्तान की ख़ूबसूरत ज़बान और हमारी विरासत है। उर्दू हमें प्यार, मोहब्बत व अमन का पैग़ाम देती है। भारतीय सभ्यता, अस्मिता और संस्कृति में उर्दू भाषा की अहम भूमिका है। अध्यक्षता करते हुए शायर महेश अश्क ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में उर्दू कविता और साहित्य ने आज़ादी के सही मायने समझाने का काम किया और अंग्रेजों के अत्याचारों से अवगत कराने के साथ ही उनके नये षड्यंत्रों का पर्दाफाश किया। मो. कामिल ख़ान ने कहा कि उर्दू ज़बान में क़ौमी एकता की झलक दिखाई देती है और इसकी ख़ास बात है कि हर कोई इसे बहुत जल्द अपना लेता है। हिंदी और उर्दू में बहुत समानताएं हैं।
कार्यक्रम के तीनों ही दिन आयोजन स्थल पर उर्दू साहित्यप्रेमियों , बुद्धिजीवियों और सामाजिक सौहार्द को प्रोत्साहित करने वाली शहर के नामचीन शख़्सियतें मौजूद रहीं। इस दौरान काज़ी तवस्सुल हुसैन,डा तारिक़ सईद, डा ओबैदुल्लाह चौधरी, मो. हाशिर अली, मिर्ज़ा रफीउल्लाह बेग, आसिम वारसी, शमसुल इस्लाम, आसिफ सईद, मो.फर्रुख जमाल, शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव, मो.यूसुफ जमाल पत्रकार, संदीप कुमार सिंह, श्रीकृष्ण चौधरी, मोहम्मद शरिक़ अली, डॉ.एहसान अहमद, तरन्नुम हसन, अनवर ज़िया, हसन जमाल बबुआ भाई, मोहम्मद रिज़वान, मोहम्मद आज़म, ज़मीर अहमद प्याम, अनवार आलम समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।

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