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July 26, 2026
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आसान नहीं योगी को हटाना !

By Shakti Prakash Shrivastva on July 26, 2026
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                                                शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश में 2017 में बीजेपी की बहुमत वाली सरकार के मुखिया बनाये गए थे योगी आदित्यनाथ. संत-महंत होते हुए भी सियासत के सारे दाँव-पेंच में पारंगत योगी आदित्यनाथ ने एक के बाद एक सियासत से लेकर सरकार में ऐसे-ऐसे प्रयोग किये जिससे उनकी लोकप्रियता दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी. खासकर क़ानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार के लिए किये गए उनके प्रयोग अन्य राज्यो के लिए नजीर बनने लगे. ऐसे में विपक्ष तो विपक्ष उनके अपने ही दल में बहुतों को योगी का तरीका अखरने लगा. सियासी गलियारे में चर्चा होने लगी कि गृहमंत्री अमित शाह भी उन्हें पसंद नहीं करते. बीच के दिनों में संयोगवश कुछ ऐसे हालात बने जिससे इस कयास को बल मिलने लगा. खासकर प्रदेश के मौजूदा बिजली मंत्री डॉ ए के शर्मा की सियासी इंट्री के समय और पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के समय ऐसी चर्चा आम हुई थी.  इसके अलावा भी प्रदेश की  राजनीति में जब भी संगठन और सरकार के बीच मतभेद या शक्ति-संतुलन की चर्चा होती, तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रिश्तों को लेकर तरह-तरह के राजनीतिक कयास लगाए जाते रहे। हाल के दिनों में भी ऐसी अटकलें तेज हुई हैं कि क्या भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पकड़ को कमजोर करने की कोशिश कर सकता है। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों का विश्लेषण करें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि अमित शाह के लिए योगी की सत्ता या राजनीतिक प्रभाव को हिलाना आसान नहीं होगा।

क्योंकि इस तर्क का सबसे बड़ा कारण योगी आदित्यनाथ का जनाधार है। सत्ता संभालने के बाद उन्होंने अपनी एक अलग राजनीतिक पहचान बनाई है। वैसे भी उनका सियासी ट्रैक रिकार्ड बताता है कि जब बीजेपी का उतना प्रभाव नहीं था तब भी उनके पार्टी के प्रतिनिधि चुने जाते रहे. कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचे के विकास और निवेश आकर्षित करने जैसे मुद्दों पर उन्होंने अपनी सरकार की अलग पहचान स्थापित की है। यही कारण है कि भाजपा का बड़ा कार्यकर्ता वर्ग भी योगी के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ माना जाता है। पूर्वांचल से शुरू हुआ उनका प्रभाव अब पूरे प्रदेश में साफ़-साफ दिखाई देता है। क्या पश्चिम बंगाल, क्या केरल और क्या हिमाचल हर जगह के चुनाव में योगी आदित्यनाथ की मांग सर्वाधिक होती है.

सियासी गलियारे में अक्सर ये चर्चा उठती है कि अब योगी हटाये जाने वाले हैं. जबकि यह भी सच्चाई है कि उनको डिस्टर्ब करना बहुत आसान नहीं है. क्योंकि उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए केवल एक राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की धुरी है। लोकसभा की सबसे अधिक 80 सीटें यहीं से आती हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद 2029 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ऐसा कोई कदम उठाने से बचेगी जिससे संगठन और सरकार के बीच टकराव का संदेश जाए। यदि योगी को कमजोर करने की कोशिश होती है तो उसका असर सीधे चुनावी प्रदर्शन पर पड़ सकता है। अमित शाह निस्संदेह भाजपा के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में गिने जाते हैं। संगठन निर्माण और चुनावी प्रबंधन में उनकी भूमिका निर्विवाद है। लेकिन भाजपा की कार्यशैली सामूहिक नेतृत्व पर आधारित रही है। इसलिए केवल अमित शाह की इच्छा से सत्ता समीकरण बदल जाएंगे, यह मान लेना व्यावहारिक नहीं होगा।

योगी आदित्यनाथ की एक और ताकत उनका स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व है। गोरखनाथ मठ के पीठाधीश्वर होने के कारण उनकी धार्मिक और सामाजिक स्वीकार्यता भी व्यापक है। यह आधार उन्हें पारंपरिक राजनीतिक नेताओं से अलग बनाता है। यही वजह है कि विपक्ष भी अक्सर भाजपा पर हमला करने के लिए सीधे योगी को निशाना बनाता है, क्योंकि वह जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा योगी ही हैं।

ऐसे में यह कहना अधिक उचित होगा कि अमित शाह और योगी आदित्यनाथ के बीच शक्ति-संतुलन की चर्चा राजनीतिक विमर्श का हिस्सा तो हो सकती है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में योगी की राजनीतिक स्थिति इतनी मजबूत है कि उन्हें केवल संगठनात्मक हस्तक्षेप से कमजोर कर पाना आसान नहीं दिखता। उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनावी सफलता का बड़ा आधार आज भी योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता, प्रशासनिक छवि और कार्यकर्ता समर्थन है। ऐसे में भाजपा नेतृत्व के लिए टकराव नहीं, बल्कि तालमेल ही सबसे व्यावहारिक और लाभकारी राजनीतिक विकल्प होगा। इसलिए स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि मौजूदा परिप्रेक्ष्य में योगी को हटाना बहुत आसान नहीं है.

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