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जानिए…कौन होगा योगी आदित्यनाथ का चुनाव में सबसे बड़ा मददगार

By Shakti Prakash Shrivastva on June 26, 2021
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लखनऊ, (शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव)। पार्टी के अंदर से लेकर बाहर तक इस समय कई-कई फ्रंटों पर जूझ रहे सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के लिए विधान सभा का आगामी चुनाव बहुत आसान नहीं होने वाला है। ऐसे में जबकि सभी विरोधों के बावजूद पार्टी ने 2022 का विधान सभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही लड़ने का लगभग मन बना लिया है। योगी को अब अपनी राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देना होगा और इन विपरीत परिस्थिति में भी अपने हितकारी परिस्थितियों को साधना होगा। क्योंकि यही स्थितियाँ उनकी नैया पार लगा सकती हैं।

यह सच है कि वैश्विक महामारी कोरोना, संगठन और सरकार में अंतर्कलह, किसान आंदोलन और चुनाव घोषणा पत्र में किए गए बेरोजगारी संबंधी वायदे उनकी राह में सबसे बड़े रोड़े के तौर पर मौजूद है। महामारी कोरोना संक्रमण के दूसरी लहर के दौरान आक्सीजन, अस्पताल में बेड, दवाइयाँ, इंजेक्शन को लेकर मचे  हाहाकार, केंद्रीय मंत्री वीके सिंह की व्यवस्था संबंधी टिप्पणी, प्रदेश सरकार के काबीना मंत्री ब्रजेश पाठक सहित विधायकों-सांसदो-कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रियाएँ यह संदेश देने के लिए काफ़ी हैं कि कोरोना की व्यवस्था में कहीं न कहीं राज्य सरकार से चूक जरूर हुई है। विपक्षियों ने भी सरकार को पंचायत चुनाव में लिप्त होने के साथ-साथ पूरी तरह फेल होना करार दिया था। हालांकि योगी ने इन तरह की खबरों को नकारात्मकता फैलाने की साजिश बताया था। किसान बिल के विरोध से उपजा किसान आंदोलन भी कहीं न कहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा संचालित होने की वजह से प्रदेश तो नहीं लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिस्सों में पार्टी का नुकसान करने की स्थिति में दिख रहा है। कुछ इलाके तो ऐसे है जहां पंचायत चुनाव में खुलकर प्रचार करने पार्टी के नेता जा भी नहीं सके थे। इसके अलावा लाखो की संख्या में प्रदेश का बेरोजगार सरकार से आस लगाए हुए यह प्रश्न कर रहा है कि घोषणा पत्र में 30 लाख रोजगार देने के वायदे का क्या हुआ। हालांकि सरकार 4 साल में 4 लाख रोजगार देने का दावा कर रही है। इन सभी से अलग एक बड़ी बाधा पार्टी का अंतर्कलह भी है। हालांकि पार्टी योगी आदित्यनाथ के ही अगुवाई में चुनाव में जाने का मन बना चुकी है लेकिन यह मन बनाने के लिए पिछले दिनों पार्टी स्तर पर जो हालात पैदा हुए थे उसे देख कर कहा जा सकता है कि अभी भी पार्टी में आल इज नाट वेल…. । अगर ऐसा हुआ या रहा तो फिर इन परिस्थितियों में आखिर योगी की विजयी भव मुद्रा कैसे दिखेगी। इस यक्ष प्रश्न का भी एक जवाब है जो योगी की वैतरणी पार कराने में अपनी अहम भूमिका अदा कर सकती है, और वो है प्रदेश में विपक्ष का बिखराव। देश में विखराव से मिलने वाले राजनीतिक फायदे का सबसे बड़ा उदाहरण गुजरात है। जहा इसका लाभ ले बीजेपी पिछले दो दशक से लगातार काबिज है। ऐसे में जबकि प्रदेश का चुनाव अब महज आठ महीने के लगभग रह गया है और प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव अभी भी क्षेत्र में उतरने की बजाय दावेदारों की सबसे निचले पायदान पर खड़े कांग्रेस की प्रियंका गांधी की बराबरी में ट्वीट की राजनीति करने में मशगूल हैं। वरिष्ठ नेताओं के पलायन से चिंतित बीएसपी प्रमुख मायावती का भी कुछ खास चुनावी प्रयास अभी तक नहीं दिख रहा है। जो कुछ और छोटे राजनीतिक दल हैं जो अकेले तो कुछ प्रभाव नहीं रखते है और तालमेल मे यदि प्रभावशाली हो भी सकते हैं तो उनका वाजिब तालमेल नहीं बन पा रहा है। ऐसे में अब योगी को अपनी पूरी राजनीतिक परिपक्वता इसी में दिखानी होगी कि वो कैसे इस बिखराव का फायदा उठा पाते है। क्योंकि यह चुनाव में योगी की सबसे बड़ी मददगार साबित हो सकती है। अगर गुजरात के इस सफल माडल वाले फार्मूले को अपनाने में योगी कामयाब हो जाते है तो उनके लिए मिशन 2022 पार करना मुश्किल नहीं होगा।

 


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