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March 9, 2026
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कैसा अंबेडकर प्रेम ?

By Shakti Prakash Shrivastva on January 9, 2025
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                                                                                 शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान गृहमंत्री अमित शाह के मुंह से निकला अंबेडकर प्रकरण थमने का नाम नहीं ले रहा है। क्या सपा, क्या बीएसपी, क्या कांग्रेस और क्या और दल। कोई विपक्षी दल ऐसा नहीं है जो अंबेडकर प्रेम के रूप में इसमें अपनी आहुति नहीं दे रहा है। संसद में किये गए विरोध से इतर ये सभी दल बयानों के अलावा सड़कों पर तक प्रदर्शन कर रहे हैं। यहाँ यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर अचानक भीमराव अंबेडकर को लेकर दलों में इतना प्रेम क्यों जग गया है।

बीते लोकसभा चुनाव को याद करिए। जब अयोध्या से बीजेपी के तत्कालीन सांसद ने अबकी बार 400 पार के पार्टी नारे पर टिप्पणी करते हुए यह कहा था कि ऐसा इसलिए कर रहे है कि इतनी सीटें मिलने पर पार्टी संविधान में आवश्यकतानुसार संशोधन करने में समर्थ हो जाएगी। कुछ इस आशय का उनका बयान था। इसके पीछे उनकी वास्तविक मंशा क्या थी नहीं मालूम। लेकिन अयोध्या में भव्य राममंदिर के लोकार्पण के बाद सियासी जमीन पर दबाव महसूस कर रहे विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिल गया। पूरे चुनाव में विपक्षी दलों ने इसे भरपूर भुनाने की कोशिश की। चुनावी सभाओं में संविधान की प्रतियां हाथों मे लहरा-लहराकर बीजेपी के लगभग तीन प्रतिशत मतों में सेंध लगाने का जो प्रयास उन्होंने किये। उसमे वो सफल भी रहे। लगभग दो प्रतिशत दलित मतदाता बीजेपी से दूर हो गए। इसका परिणाम ये रहा कि लगातार तीसरी बार बहुमत की सरकार बनाने का सपना पालने वाली बीजेपी का सपना अधूरा रह गया। बीजेपी की सरकार तो बनी लेंकिन उसे अपने सहयोगियों की सहायता लेनी पड़ी। अब इसी दलित मतदाताओं को अपने पाले में बनाए रखने के लिए विपक्ष इस अंबेडकर प्रेम को सीने से लगाए घूम रही है। या ये कहें उसका इस्तेमाल् कर रही है। काँग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी समेत समूचा विपक्ष अपने को दलित, अंबेडकर और संविधान के सम्मान के सबसे बड़ा हितैषी साबित करने में लगे हुए है।

अब इस मुहिम में दलित हितैषी बन चार-चार बार उत्तर प्रदेश में सरकार बना चुकी बीएसपी भी अपनी पुरानी जमीन तलाशने के लिए कूद चुकी है। अपने विशेष सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले की बदौलत 2007 से 2012 तक उत्तर प्रदेश में बहुमत की सरकार चलाने के बाद बीएसपी की मौजूदा तस्वीर ये है कि वो सियासी हाशिये पर पहुँच चुकी है। उसका अपना दलित मतदाता पार्टी से सरक कर संअजवादी पार्टी और बीजेपी जैसे दलों का रुख कर लिए है। आज हालत ये है कि प्रदेश की विधानसभा में उसका एकमात्र विधायक है। जबकि लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है। ऐसे में उसने अरसे बाद पिछले दिनों अंबेडकर मुद्दे पर देशव्यापी प्रदर्शन कर अपनी उपस्थिति जताई है। इस तरह से सभी विपक्षी दलों को ऐसा लग रहा है कि अंबेडकर कि बदौलत वो देश के दलित मतदाताओं में जगह बनाने में आसानी से सफल हो जाएंगे। इसी मकसद से वो एक तरफ अंबेडकर प्रेम जता रहे है तो दूसरी और बीजेपी समेत सत्ताधारी एनडीए गठबंधन सरकार का विरोध कर रहे है।

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