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July 26, 2026
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नाकाम रहा विपक्ष, जीत गई सीजेपी!

By Shakti Prakash Shrivastva on July 26, 2026
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                                                शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

जिस तरह समाज ने पीढीगत बदलाव को समझते हुए अपने में बदलाव कर लिया है उसी तरह अब देश के सियासी समाज या उनके अलंबरदारों को भी इस सामयिक परिवर्तन का अहसास करते हुए इसे आत्मसात करना पडेगा. दिल्ली के जंतर-मंतर पर जिस तरह नीट-यूजी पेपर लीक के खिलाफ चले छात्र आंदोलन ने रूप दिखाया है यह एक बानगी है. इसने भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। आज शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सबसे अधिक चर्चा जिस संगठन की हो रही है, वह है कॉकरोच जनता पार्टी यानि सीजेपी। महज दो महीने पहले व्यंग्य के रूप में शुरू हुआ यह मंच आज राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है। इसके संस्थापक अभिजीत दिपके ने इस्तीफे के बाद कहा, “झुकती है दुनिया, बस झुकाने वाला चाहिए।” उनका दावा है कि छात्रों की एकजुटता ने वह कर दिखाया, जो वर्षों से विपक्ष नहीं कर सका।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले एक दशक में केंद्र सरकार के किसी मंत्री को बड़े जनदबाव के बीच पद छोड़ने की नौबत शायद ही आई हो। 2014 के बाद कई मंत्रियों को हटाया गया, लेकिन वे निर्णय कैबिनेट विस्तार या राजनीतिक कारणों से जुड़े थे। इस बार मामला अलग था। नीट-यूजी परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों का गुस्सा लगातार बढ़ता गया और अंततः सरकार को बड़ा राजनीतिक फैसला लेना पड़ा।

इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यह रही कि इसकी कमान किसी व्यक्ति या दल के हाथों में नहीं बल्कि स्वयं छात्रों के हाथ में थी। सोशल मीडिया पर शुरू हुआ अभियान धीरे-धीरे सड़कों तक पहुंचा और फिर राष्ट्रीय आंदोलन में बदल गया। अभिजीत दिपके ने जिस सीजेपी की शुरुआत व्यंग्य के तौर पर की थी, वह युवाओं के असंतोष की आवाज बन गई। इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की लंबी भूख हड़ताल ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके जुड़ने से आंदोलन को नैतिक बल मिला और मीडिया का ध्यान लगातार इस मुद्दे पर बना रहा।

हालांकि, आंदोलन के दौरान विपक्षी दल भी सक्रिय रहे। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी सहित कई दलों के नेता जंतर-मंतर पहुंचे और छात्रों के समर्थन में दिखाई दिए। संसद के भीतर और बाहर सरकार को घेरने की कोशिश भी हुई। लेकिन पूरे आंदोलन में एक बात साफ दिखाई दी कि तमाम सियासी प्रयास के बावजूद नेतृत्व छात्रों के हाथ में ही रहा। विपक्ष समर्थन तो देता रहा, लेकिन आंदोलन का चेहरा नहीं बन पाया। यही कारण है कि इस सफलता का राजनीतिक श्रेय मुख्य रूप से छात्रों और सीजेपी को ही मिल रहा है।

यह घटनाक्रम विपक्ष के लिए भी बड़ा संदेश लेकर आया है। वर्ष 2021 के किसान आंदोलन की तरह इस बार भी वही वर्ग आंदोलन का नेतृत्व कर रहा था, जो सीधे प्रभावित था। दोनों आंदोलनों में विपक्ष की भूमिका सहायक रही, निर्णायक नहीं। इससे यह संकेत मिलता है कि आज का युवा किसी राजनीतिक दल के झंडे से अधिक अपने मुद्दों पर भरोसा करता है। वह संगठित होकर अपनी लड़ाई स्वयं लड़ना चाहता है।

सीजेपी की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। मई 2026 में शुरू हुआ यह व्यंग्यात्मक मंच शुरुआत में केवल सोशल मीडिया तक सीमित था। लेकिन नीट-यूजी विवाद ने इसे वास्तविक जनआंदोलन का रूप दे दिया। ऑनलाइन लोकप्रियता को ऑफलाइन समर्थन में बदलना किसी भी अभियान के लिए सबसे कठिन चुनौती होती है, जिसे सीजेपी काफी हद तक पार करती दिखाई दी।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री के पद छोड़ने की घटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत भी है कि देश का युवा अब शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही चाहता है। इस आंदोलन ने यह भी साबित किया कि स्पष्ट मुद्दा, प्रभावित लोगों का नेतृत्व और शांतिपूर्ण जनदबाव किसी भी लोकतंत्र में प्रभावी साबित हो सकता है। विपक्ष के लिए यह आत्ममंथन का अवसर है, जबकि सरकार के लिए शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करने की चुनौती। फिलहाल इतना तय है कि इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति के समीकरणों पर नई बहस छेड़ दी है। देश-दुनिया के सामने नेपाल में हुआ सत्ता परिवर्तन एक उदहारण है ही.

 

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