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जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव : भाजपा के जाल में उलझे अखिलेश

By Shakti Prakash Shrivastva on June 29, 2021
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गोरखपुर, (विनय रंजन तिवारी)।   भाजपा एक राजनीतिक दल भले ही है लेकिन इसकी नीतियों का निर्धारक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है। हालांकि संघ इसे कभी स्वीकार नही करता है। संघ के संगठनात्मक ढांचे के बारे में जानकारों का मानना है कि इसका बौद्धिक प्रकोष्ठ बहुत समृद्ध है। उसमें सामाजिक चिंतक और विद्वानों की एक बड़ी जमात है। जो समय-समय पर योजनाओं के क्रियान्वयन से पूर्व बारीकी से विश्लेषण करते हैं। यही वजह है कि अमूमन इनकी योजनाएँ बहुत सटीक और कारगर साबित होती हैं। पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से उत्तरप्रदेश में भाजपा के अंतर्कलह और सपा के बढ़ते जनाधार की खबरें आ रही थीं उससे संघ के माथे पर चिंता की रेखाएं उभरने लगी थी। इसे देखते हुए ही यूपी भाजपा में काफी उलट फेर किया गया लेकिन फिर भी कोई अपेक्षित सुधार होते नही दिख रहा था। ऐसे में पिछले दिनों पंचायत स्तरीय चुनाव से उत्साहित सपा प्रमुख द्वारा जिला पंचायत अध्यक्षी चुनाव में जिस तरह हताशा में प्रदेश के ग्यारह जिलाध्यक्षों की बर्खास्तगी का आदेश आया। उसने चिंतित संघ और भाजपा को ऑक्सीजन देने का काम कर दिया। जानकारों का तो यह भी मानना है कि अखिलेश का इस एक्शन के मूल में भी कहीं न कहीं संघ की कोई चाल ही है, जिसमे अखिलेश फंस गए।

सूत्रों की मुताबिक इन दिनों प्रबुद्धजनों व नुक्कड़ चौराहों पर हो रही चर्चा से यह बात उभरकर आ रही है कि जिन जिलाध्यक्षों ने 2022 के चुनाव के लिए गली-गली घूमते हुए हाड़तोड़ मेहनत करना शुरू कर दिया था उनकी बर्खास्तगी पूरे प्रदेश के कार्यकर्ताओं के मनोबल को तार-तार करके रख देगी। इसने भाजपाइयों को भी मतदाताओं के रिझाने लिए एक मजबूत आधार दे दिया। अवकाशप्राप्त प्रो. बी के सिंह यादव का कहना है कि सपा का यह निर्णय जल्दीबाजी में किया गया एक नासमझी भरा और आत्मघाती फैसला है। यह इस सन्देश को और गहरा कर रहा है कि सपा के संगठन में कोई दूरदर्शी व बड़ा योजनाकार नही है जो बढ़ते जनाधार को रफ्तार देने का मंत्र दे सके। सामाजिक चिंतक सरयू प्रसाद का कहना है कि सपा सुप्रीमो को पहले 3 या 4 सदस्यीय जांच समिति गठित करते हुए जिलाध्यक्षों की लापरवाही के प्रमुख बिंदुओं पर विचार-विमर्श कर कोई अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए था क्योंकि भाजपा तो लगातार चुनावों में सरकारी तंत्र का अपनी निजी सम्पति की तरह इस्तेमाल कर रही है। ऐसे में अखिलेश ने ऐसा कर कहीं न कहीं भाजपा को सहयोग ही दिया है। पेशे से चिकित्सक डॉ राहुल श्रीवास्तव का कहना है कि यह सच्चाई है कि भाजपा से लोग कितने भी नाराज हों लेकिन योगी जी की लोकप्रियता अभी भी जस की तस बनी हुई है। ऐसे में मुझे नही दिखता की इस तरह की बचकाना फैसले करने वाली सपा योगी या भाजपा को कोई मजबूत चुनौती दे सकेंगी। मुलायम सिंह यादव के समय के राजनेता और राजनीतिक विश्लेषक भी अखिलेश के इस फैसले से हतप्रभ हैं। उन्हे उत्तर प्रदेश जैसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री रह चुके राजनेता से ऐसे निर्णय की उम्मीद नहीं थी। उनका मानना है कि संभव है कि अपने राजनीतिक हित के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने वाले दल के साजिश का शिकार हो गए अखिलेश। ऐसे में जबकि विधानसभा चुनाव महज आठ महीने दूर है देखना दिलचस्प होगा कि प्रदेश की प्रमुख विपक्षी दल सपा अपनी कमियों से निजात पाते हुए कैसे चुनावी बिसात बिछाती है।


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