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आखिरकार बंगाल में बीजेपी सरकार, मुखिया बने सुर्वेंदु!

By Shakti Prakash Shrivastva on May 9, 2026
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                                                                                            शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

बंगाल में लगभग पंद्रह वर्षों से काबिज तृणमूल कांग्रेस से जिस तरह प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता छीन कर बीजेपी ने सरकार बनाने में कामयाबी पायी है वो अपने आप में एक रिकार्ड है। चुनाव से पहले ये तो लग रहा था की बीजेपी के प्रति बंगाली मतदाताओं में रुझान बढ़ रहा है। लेकिन यह अनुमान नहीं लग पाया की वो रुझान इतना बढ़ गया है कि 294 सदस्यीय विधानसभा में 207 सीटें सिर्फ और सिर्फ बीजेपी ही पा जाएगी। बहरहाल अंत भला तो सब भला। आखिरकार बंगाली मानुष और कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में रहकर सियासी ककहरा सीखने वाले सुर्वेंदु कुमार ने शनिवार नौ मई को बंगाल के नौवे मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले ली।

जिस सुर्वेंदु अधिकारी को बीजेपी ने बंगाल विधायक दल का नेता चुनते हुए मुख्यमंत्री बनाया है। दरअसल उनका सियासी सफर कांग्रेस से होकर यहाँ तक पहुंचा है। सुर्वेंदु के पिता खाँटी कांग्रेसी थे। 1995 में उन्होने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की। 1995 में ही वो पहली बार कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में पूर्वी मेदिनीपुर की कांथी नगर पालिका में पार्षद चुन लिए गए। हालांकि, सुर्वेंदु और कांग्रेस का यह साथ ज्यादा लंबा नहीं चला। 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस का गठन किया, तो सुर्वेंदु और उनका पूरा परिवार भी टीएमसी का हिस्सा बन गया। इसी के चलते अधिकारी परिवार को कोई बार टीएमसी के सह-संस्थापकों के तौर पर भी जाना जाता है। राज्य स्तर की सियासत में उनकी इंट्री 2006 में हुई। वह कांथी दक्षिण निर्वाचन क्षेत्र से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में जीतकर पहली बार पश्चिम बंगाल विधानसभा पहुंचे। इसी वर्ष उन्हें कांथी नगर पालिका का अध्यक्ष भी चुना गया। टीएमसी में रहते हुए सुर्वेंदु ने ग्रामीण बंगाल में गहरी पैठ बनाई। उनके नेतृत्व को देखते हुए ममता बनर्जी ने उन्हें ‘जंगल महल’ क्षेत्र, पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुड़ा का प्रभारी बनाया। इन सभी जगहों पर उन्होंने टीएमसी का सफलतापूर्वक विस्तार किया। इसके अलावा, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में भी कांग्रेस को कमजोर कर टीएमसी को मजबूत करने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।

हालांकि बाद के दिनों में सुर्वेंदु और टीएमसी के बीच मनमुटाव बढ्ने लगा। क्योंकि ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक को पार्टी के चेहरे के रूप में अपने बाद पेश करने लगी। सुर्वेंदु को यह नागवार लगा। बाद में 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर का प्रभाव भी बढ़ने लगा था, जिनसे सुर्वेंदु के गहरे मतभेद थे। इनहि सब कारणों के चलते आखिरकार 2021 में उन्होंने टीएमसी से सारे नाते तोड़ लिए। 2021 के बंगाल विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले 19 दिसंबर 2020 को सुर्वेंदु अधिकारी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में आधिकारिक रूप से बीजेपी में शामिल हो गए।

2021 के चुनाव में भी बीजेपी को पाँव पसारने में इनकी अहम भूमिका रही। हालांकि उनके साथ दिलीप घोष और कैलाश विजयवर्गीय सरीखे नेता भी थे। ऐसे में 2021 के चुनाव में सुर्वेंदु को उतना दायरा नहीं मिला, जितना उन्हें 2026 के चुनाव में मिला। इसके बाद सुर्वेंदु ने न सिर्फ बीजेपी को चुनाव जिताने में बड़ी भूमिका निभाई, बल्कि खुद भी लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनाव हराया।

यही वजह रही जब 207 की संख्या में विधायक चुनकर आए तो बीजेपी खासकर अमित शाह ने सुर्वेंदु को मुख्यमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि अमित शाह ने प्रचार के दौरान ही यह संकेत दे दिया था कि कोई बंगाली मानुष ही मुख्यमंत्री बनेगा।

 

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