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इलेक्टोरल बांड नहीं बन पाया इलेक्शन ब्रांड!

By Shakti Prakash Shrivastva on April 10, 2024
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

लोकसभा चुनाव की घोषणा के काफी पहले से ही चुनाव को लेकर अलग-अलग सियासी पार्टियां अपना सियासी एजेंडा सेट करने में लग गई थी। पिछले दिनों इस एजेंडे के चयन के दौरान एक ऐसे मुद्दे ने सुर्खियां बटोरनी शुरू कर दीं। जो इलेक्शन की दशा और दिशा दोनों ही बदलने का माद्दा रखती थी। लेकिन जैसे-जैसे इलेक्शन का समय नजदीक आया ऐसा लगने लगा कि उस मुद्दे की हवा निकलती जा रही है। मुद्दा है इलेक्टोराल बांड का। वह बांड जिसके जरिए करीब 12 हजार करोड़ से अधिक के चुनावी चंदे को लेकर खूब हो-हल्ला मचा। एकबारगी ऐसा लगा कि इस मुद्दे की फसल चुनाव के दौरान खूब लहलहाएगी। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अलबत्ता दूर-दूर तक इस फसल का चुनाव के दौरान कोई नामलेवा नहीं दिख रहा। अब तो यह मुद्दा राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप तक ही सिमट कर रह गया है। मौजूदा सियासी मौसम में बॉन्ड को सियासत के ‘गरमागरम छौंक’ के रूप में देखने वाले राजनीतिक दल भी अब बखूबी समझने लगे हैं कि फिलहाल इस चुनाव में यह मुद्दा वोट में तब्दील नहीं हो पाएगा। जिस इलेक्टोरल बॉन्ड की चर्चा यहाँ हो रही है उसमें लगभग 1300 संस्थाओं द्वारा लगभग 12,000 करोड़ रुपये से अधिक के बॉन्ड खरीदे गए थे।

इन बॉन्डों को देश के कुल 23 राजनीतिक दलों को दिया गया। इसे लेकर बहस तो बहुत छिड़ी लेकिन यह बहस चुनावी मुद्दा का रूप अख्तियार नहीं कर सका। लिहाजा सियासी पार्टियों ने भी इसे अब स्वीकार कर लिया है।  अब यहाँ यह जान लेना भी आवश्यक है कि इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये चंदा उन्ही राजनीतिक दलों को मिल सकता है जिसने पिछली लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम-से-कम एक फीसदी वोट हासिल किया हो। नियमों में यह बदलाव महज इसलिए किया गया कि इससे उन चंदों पर रोक लगाया जा सके जो उन दलों को दिए जाते हैं जो चुनाव में हिस्सा नहीं लेते। इलेक्टोरल बॉन्ड किसी भी वित्त वर्ष की एक तिमाही में केवल 10 दिनों के लिए जारी किए जाते हैं। लोकसभा चुनाव के साल में 30 दिन का अतिरिक्त समय दिया जाता है। एसबीआई की कुछ चुनिंदा शाखाओं से जारी होने वाले चुनावी बॉन्ड की वैधता, जारी करने के 15 दिनों तक रहती है। चंदा देने वाले को इन्हीं 15 दिनों के दौरान अपने पसंदीदा राजनीतिक दल के खाते में बॉन्ड को कैश कराना होता है। ये बॉन्ड कम से कम एक हजार और अधिकतम एक करोड़ रुपये के हो सकते हैं। चुनावी बॉन्ड के खरीदार को सभी केवाईसी नियमों को पूरा करना होता है, ताकि अवैध खाते से इन बॉन्डों की खरीद न हो सके।

बांड के बारे में नकारात्मक विचार रखने वालों को जानकार बताते हैं कि इस तरह चंदा देने की परंपरा कोई नई थोड़े ही है। ऐसा पहले भी होता था। अंतर सिर्फ ये है कि पहले कैश देते थे। बॉन्ड आने के बाद अब बैंक के जरिये दिए जा रहे हैं। अलबत्ता घाटे वाली कंपनियां यदि भारी भरकम चंदा दे रही हैं तो इनकी जांच होनी चाहिए। जानकारी के लिए यह जानना आवश्यक है कि वर्ष 2004 से वर्ष 2014 के बीच राजनीतिक दलों को कुल मिले चंदे में से करीब 70 फीसदी का स्रोत अज्ञात था।

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