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July 22, 2026
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योगी का ‘योग’ : अखिलेश चारों खाने चित्त

By Shakti Prakash Shrivastva on July 9, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

गोरखपुर स्थित नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर से देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री जैसे अहम पद तक पहुँचने वाले महंत योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक परिपक्वता को लेकर कयास लगाने वालों को योगी ने अपनी परिपक्वता का डोज देना शुरू कर दिया है। हालांकि इसका एहसास तो उन्होंने साँसदी पारी से ही कराना शुरू कर दिया था लेकिन लोगों को ठीक से महसूस अब हो रहा है। सरकार के पहले कार्यकाल में दुनियावी व्यवस्था को हिला देने वाली महामारी कोरोना से लेकर बीजेपी पार्टी के अंदर और बाहर बैठे विरोधियों तक पर जिस तरह से योगी ने लगाम लगाया ये उनकी परिपक्वता का सबसे बड़ा उदाहरण है। प्रदेश में उपजी राजनीति की विपरीत परिस्थितियों में हुए विधानसभा चुनाव में बहुमत के जरिए दुबारा प्रदेश की सत्ता पर काबिज होना उनका दूसरा सबसे अहम उदाहरण है। राजनीति के धुरंधरों का मानना है कि लोकतंत्र में विपक्ष को कमजोर स्थिति में रखना भी एक कौशल माना जाता है। इस मायने में भी योगी का कोई सानी नहीं। उन्होंने सहयोगियों को पलक पर रखा तो वही विरोधियों को उनकी औकात में। जब प्रदेश में पहली बार सरकार बनी तो उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और सहयोगी दल सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर को लेकर तरह-तरह की चरचाए होती रही लेकिन सरकार ने निर्बाध अपना कार्यकाल पूरा किया। राजभर की ऐंठन बढ़ी तो सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया। विधानसभा चुनाव के दौरान राजभर द्वारा लगातार दी गईं अमर्यादित टिप्पड़ियों पर योगी की तरफ से कोई विशेष प्रतिक्रिया नही दी गई। चुनाव परिणाम सबके सामने आया। सरकार के दूसरे कार्यकाल में सरकार गठन को लेकर केशव प्रसाद मौर्य, ए के शर्मा, बेबी रानी मौर्य, ब्रजेश पाठक जैसे कुछ नामों पर संगठन और योगी में स्थितियाँ असहज होते दिखीं लेकिन वो भी बाद में सामान्य हो गया। प्रदेश की प्रमुख विपक्षी दल सपा की चुनौतियाँ सामने आ सकती थीं लेकिन इससे पहले ही योगी आदित्यनाथ की परिपक्व राजनीतिक कौशल ने ऐसा योग दिखाया कि अखिलेश चारों खाने चित्त नजर आए। धोबिया पाट और चरखा दांव जैसे कई राजनीतिक सुर्खियों वाली समाजवादी पार्टी को योगी के इस योग का कोई काट समझ नही आया। देश का बडा और अहम सूबा होने के नाते राष्ट्रपति चुनाव की सर्वाधिक सरगरमियाँ भी यही होनी थी। संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा लखनऊ आए। उन्होंने समाजवादी सुप्रीमो अखिलेश यादव और रालोद चीफ जयंत चौधरी के साथ प्रेसवार्ता भी की लेकिन उनके साथ प्रमुख सहयोगी सुभासपा के ओम प्रकाश राजभर और शिवपाल यादव नदारद रहे। अभी राजनीतिक हल्के में ये चर्चा शुरू ही हुई थी कि इसके मायने क्या है कि योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक योग ने उसका भी उत्तर दे दिया। शुक्रवार को जब राष्ट्रपति पद की एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू लखनऊ पहुंची। उनके स्वागत में योगी ने अपने मुख्यमंत्री आवास पर स्वागत रात्रिभोज का आयोजन किया। भोज में प्रमुख विपक्षी घटक के सहयोगी सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर, सपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव सहित बीएसपी के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह की उपस्थिति ने न केवल समाजवादी कुनबा बिखरने का प्रमाण दिया बल्कि भविष्य में गठबंधन की नयी सियासत के संकेत भी दिए। इसने एक बार राजनीति के जानकारों को आश्वस्त कर दिया कि अब योगी आदित्यनाथ राजनीति के मझे हुए धुरंधर हो गए हैं। विपक्षियों को इन्हे महज योगी, बाबा और महंत ही समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। इनके लिए ये शब्द उनकी तप-साधना और सनातनी संस्कार का परिचायक है न कि अपरिपक्वता का। योगी आदित्यनाथ ने ओम (ओमप्रकाश राजभर), शिव (शिवपाल) और उमा (उमाशंकर) की तिकड़ी से राजनीति की जो चौकड़ी भरी है उसका प्रदेश की राजनीति में दूरगामी परिणाम दिखेगा। इतना ही नहीं भोज में मौजूद जनसत्ता दल के प्रमुख राजा भैय्या ने भी द्रौपदी मुर्मू को उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर प्रधानमंत्री को धन्यवाद दे योगी कौशल कि रही-सही कसर भी पूरी कर दी।

 

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