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दीपावली : दीपोत्सव से हुई दीयों की ब्रांडिंग, बाजार में बढ़ी मांग, कुम्हारी कला को मिली संजीवनी

By Shakti Prakash Shrivastva on October 22, 2022
0 179 Views

शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव की आवाज में  पूरी रिपोर्ट  सुनने के लिए क्लिक करें।

शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

दीपावली जैसे त्योहार में कभी मिट्टी के बने दीये और खिलौने जो कुम्हार के घर के सालों-साल जीविका के आधार होते थे। उसके प्रति लोगों के हो रहे मोहभंग के चलते कुम्हारी का रोजगार लगभग समाप्त होने की कगार पर पहुँच गया था। लेकिन जबसे प्रदेश में योगी सरकार आई है उसने कुम्हारों की जिन्दगी मे संजीवनी देने का काम किया है। अयोध्या का दीपोत्सव, काशी की देव दीपावली सहित छोटे-बड़े शहरो-कस्बों तक में हो रहे दीपोत्सव कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। इन आयोजनों ने मिट्टी के दीयो की ब्रांडिंग करने का काम किया है। इससे बाजार में इनकी ख़ासी मांग बढ़ गयी है। अब इन दीयों और मिट्टी से बने बर्तनों आदि की बढ़ती मांग के चलते कुम्हार के घरों में खुशहाली फिर से वापस आ रही है। इस बार कुम्हारों के यहाँ पिछले वर्षों की तुलना में दुगुने से भी अधिक आर्डर मिले हैं। अरसे से मायूस कुम्हार खासे खुश हैं।

बाजार में बढ़ी दीयों की मांग

गोरखपुर के औरंगाबाद, भटहट, भरवालिया, सरइयाँ सहित दर्जनों टेराकोटा गाँव ऐसे हैं जिनकी रौनक इस समय देखते बन रही है। मिट्टी के बने दीयों, बरतनों और तरह-तरह की आकृतियों के लिए व्यापारी गाँव में आकर आर्डर दे रहे है। टेराकोटा शिल्पी नंदलाल की मुताबिक एक लंबे अरसे के बाद ऐसा मौका आया है जब बाजार में इस तरह दीयों की डिमांड दिख रही है। इस बार तो ऐसा लग रहा है कि सिर्फ दीपावली के ही कारोबार से कुम्हारों की खासा सालाना आमदनी हो जाएगी। इसके लिए नंदलाल सौ फीसदी सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को क्रेडिट देते हैं। उनका मानना है कि योगी जी के ओडीओपी (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) स्कीम ने गोरखपुर के कुम्हारों की जिंदगी बदलने का काम किया है। भरवालिया के कुम्हार अनिल का कहना है कि प्लास्टिक पर लगी पाबंदी और दीपोत्सव से बदले हुए माहौल ने कुम्हारी कला को नया जीवन दिया है। काम बढ़ने से सबसे बड़ा फायदा ये हुआ है कि जो युवा इस पेशे पर ध्यान नहीं देते थे अब उनका भी इस ओर रुझान बढ़ा है।

मददगार है इलेक्ट्रिक चाक
बाजार में अचानक बढ़ी डिमांड में इलेक्ट्रिक चाक मददगार बन रहा है। क्योंकि इतनी डिमांड की भरपाई हाथों से संभव नही। सरकार की ओर से मिले इलेक्ट्रिक चाक की मदद से अब एक दिन में चार से पांच गुना ज्यादा दीये तैयार हो जा रहे हैं। पहले दीपावली के लिए हाथों से दीपक तैयार करने के लिए छह महीने पहले से जुट जाते थे। इलेक्ट्रिक चाक आने के बाद अब दो से ढाई महीने में अच्छी मात्रा में दीये तैयार हो जाते हैं।

बच जाएगी विलुप्त होती कला

इस समय गाँव के किसी भी कुम्हार को एक पल की भी फुर्सत नहीं है। इस बार दीयों के साथ-साथ गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियों से लेकर खिलौनों तक की मांग बढ़ी है। रसोई के सामान, घंटी, गुल्लक, चकिया, चूल्हा, कार, तरह-तरह की मूर्तियाँ सहित विभिन्न प्रकार के खिलौने बन रहे हैं। इस बार दीयों या मिट्टी से बने सामानों के प्रति जो बाजार का आकर्षण बढ़ा है उससे न केवल एक परंपरागत कला विलुप्त होने से बच जाएगी बल्कि इको फ्रेंडली उत्पाद भी मिलेंगे।

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