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यूपी : कुछ ‘मायनों’ के लिए याद किया जाएगा विधानसभा-2022 चुनाव

By Shakti Prakash Shrivastva on January 22, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

            यूं तो हर चुनाव में कुछ ऐसी घटनाए या गतिविधियां हो जाती है जिसके लिए उस चुनाव को गाहे-बेगाहे याद किया जाता है। इस बार उत्तर प्रदेश में हो रहे 2022 के  विधानसभा चुनाव में किसी दल के हार और जीत के अलावा भी कुछ चीजें पहली बार ऐसी हो रही है जिसके लिए इस चुनाव को याद किया जाएगा साथ ही वो इतिहास में दर्ज भी होगा। मसलन आजाद हिंदुस्तान में उत्तर प्रदेश का यह विधानसभा का चुनाव पहला ऐसा चुनाव हो रहा है जिसमें कोरोना महामारी की विशेष परिस्थितियों की वजह से राजनीतिक दलों को चुनावी रैलियाँ करने पर प्रतिबंध है। कोविड-19 प्रोटोकाल के निर्धारित सीमाओं के बीच दलों और उनके प्रत्याशियों को प्रचार करना पड रहा है। यह भी पहली बार ही हो रहा है कि बहुत बड़े फ़लक पर चुनाव प्रचार वर्चुअल प्लेटफार्म के जरिये किया जा रहा है। इसके पहले भी कुछ चुनावो में हालांकि सोशल मीडिया प्लेटफार्मो का सहारा प्रचार के लिए लिया जाता रहा है लेकिन इतने व्यापक रूप में पहली बार हो रहा है। राजनीतिक दलों द्वारा वार रूम बनाया गया है। जहां से इन वर्चुअल गतिविधियों को संचालित किया जा रहा है। आई टी विशेषज्ञ और रुरल न्यूज नेटवर्क के IT एड्वाइजर नितिन वर्मा की मुताबिक जो दल या उम्मीदवार आई टी की उपयोगिता समझते है उनके लिए इस बार का चुनाव न केवल कम खर्चीला होगा बल्कि अपने कोर मतदाताओं तक उनका पहुंचना और उनके बीच अपनी बात रखना उनके लिए अपेक्षाकृत आसान होगा। चुनावों मे तकनीकी का इस बार की तरह का प्रयोग होने मे वैसे तो कई साल लगते लेकिन कोरोना की वजह से इसका जरूरत के हिसाब से पहले ही प्रयोग शुरू हो गया है। इससे आई टी क्षेत्र के बेरोजगारों को भी खासे तादाद मे रोजगार मिल गया है। क्योंकि चुनावों में डिजाइनर, राइटर, प्रोमोटर और सोशल मीडिया हंडलर आदि के रूप में लाखों युवाओं को काम मिल गया है। इन्टरनेट क्रांति के चलते आज हर विधानसभा क्षेत्र में लगभग अस्सी फीसद से भी अधिक तादाद में मतदाता सोशल मीडिया के फेसबुक, ट्वीटर, यूट्यूब, व्हाट्सप, इन्स्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म को बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके अलावा यह चुनाव इसलिए भी याद किया जाएगा कि इस चुनाव मे पहली बार ऐसा हो रहा है कि लगातार बहुमत की पूरे पाँच साल सरकार चलाने वाले तीन-तीन मुख्यमंत्री अपने दलों के साथ चुनावी समर में अपना भाग्य आजमा रहे है। जैसे बीजेपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की मायावती। उत्तर प्रदेश के अस्तित्व में आने से लेकर आज तक इन नामों के अलावा सिर्फ डॉ सम्पूर्णानन्द ही एक ऐसे मुख्यमंत्री रहे जिन्होने बहुमत की सरकार में अपना पूरा कार्यकाल बिताया हो। सन 1954 से सन 1960 तक वे मुख्यमंत्री रहे। इधर लगभग 47 साल बाद फिर ऐसी स्थिति आई कि सन 2007 में बीएसपी की बहुमत की सरकार में मायावती मुख्यमंत्री बनी और उन्होने अपना पूरा कार्यकाल 2012 तक निर्बाध बिताया। 2012 में समाजवादी पार्टी बहुमत में आई और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 2017 तक सरकार चलाया। इसके बाद 2017 में बीजेपी की सरकार प्रचंड बहुमत से आई और योगी आदित्यनाथ के हाथों राज्य की कमान बतौर मुख्यमंत्री 2022 विधानसभा चुनाव तक के लिए है। इधर की बहुमत सरकारों में एक बात और खास रही कि इन तीनों ही पार्टियो की विचारधारा अलग-अलग है। प्रदेश में आंकड़ो के जानकारों का मानना है कि प्रदेश में सत्तारूढ़ दल की सत्ता में वापसी का इतिहास नहीं है। ऐसे में यदि बीजेपी चुनाव जीतती है तो यह भी एक रिकार्ड ही होगा। इस तरह से विधानसभा का यह चुनाव कई मायनों में इतिहास बनाने जा रहा है।

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