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संत नरेंद्र गिरि का सुसाइड : मिली ‘इज्जत’ खोने के डर ने किया मरने को बाध्य!

By Shakti Prakash Shrivastva on September 21, 2021
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

एक संत जो जीवन भर हिन्दू और हिन्दुत्व की अलख के साथ समाज में सनातन धर्म के ध्वज वाहक सरीखा कृत्य करता रहा। संत से संगम स्थली प्रयागराज के प्रतिष्ठित श्री बाघम्बरी गद्दी बड़े हनुमान जी मंदिर का महंत बना। इतना ही नहीं संत-महात्माओं की सर्वलोकप्रिय प्रतिष्ठित संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष के रूप में समाज में ख़ासी प्रतिष्ठा अर्जित किया। लेकिन अफसोस ये कि इतना सब कुछ पाने के बाद भी इसे ही खोने के डर ने महंत श्री नरेंद्र गिरि महराज को आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर कर दिया। सोमवार को दोपहर में खाने के बाद विश्राम करने संत प्रयागराज के बाघम्बरी गद्दी स्थित अपने कमरे में गए लेकिन नित्य की भांति साँय जब कमरे से बाहर नहीं आए तो शिष्यों ने देखा कि महंत श्री का शरीर पंखे से लटक रहा है। पुलिस को सूचना दी। दरवाजा तोड़कर शरीर को पंखे से नीचे उतारने से पहले ही सब कुछ समाप्त हो चुका था। महंत सदा-सदा के लिए मायावी संसार से नाता तोड़ ब्रह्मलीन हो चुके थे। पुलिसिया तफतीश के दौरान कमरे में मिले महंत श्री के सुसाइड नोट को आधार माने तो आत्महत्या को कायरता और पलायनवादिता करार दे ऐसा न करने की सामान्य मनुष्य को नसीहत देने वाले संत ने वही सब कुछ स्वयं किया। उन्हे भी सामान्य मनुष्य की भांति ‘इज्जत’ लुटने के डर ने ऐसा भीतर तक डरा दिया कि एक बार पूर्व में 13 सितंबर की तिथि निर्धारित करने के बाद भी आत्महत्या की हिम्मत न जुटा पाने वाले महंत नरेंद्र गिरि ने पंखे से झूल कर फांसी लगा ली। सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख है कि पूर्व में उनसे संपत्ति को लेकर विवाद कर चुके उन्ही का शिष्य आनंद गिरि कंप्यूटर के सहारे किसी औरत के साथ अंतरंग क्षणों का उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करने वाला है। इस तरह के प्राप्त इनपुट से संत अघोषित भय से ग्रस्त हो गए। उन्होने बाकायदा यह भी जिक्र किया है कि आखिर ऐसा होने पर वो किस-किस से सफाई देते फिरेंगे। इस मनः स्थिति का विश्लेषण करते हुए दिल्ली की मनोविज्ञानी प्रतिमा श्रीवास्तव मानती है कि संत भी मूलतः एक इंसान है। उसके अंदर भी चेतन-अवचेतन के मनोविज्ञानी प्रभाव होते है। जब संत को विश्वास पूर्वक इस बात की जानकारी हुई कि उनकी तस्वीर इस तरह मीडिया में वायरल होने वाली है तो उन्हे लगा कि इस तरह मेरी जिंदगी की चारित्रिक कमाई क्षणभर में समाप्त हो जाएगी। इस अघोषित क्षणिक भय से उपजे भाव की वजह से ही उन्होने ऐसा रास्ता चुना। क्योंकि यह एक कड़वी सच्चाई है कि जितनी बड़ी काँच की दीवार होगी उतना ही बड़ा उसके टूटने का भय भी होगा। चूंकि महंत जी की आध्यात्मिक और सामाजिक छवि काफी बड़ी थी लिहाजा उन्हे उसके खोने का डर भी उतना ही अधिक था। यही वजह रही कि जीवन की समस्त सच्चाईयों से वाकिफ संत को भी ऐसे रास्ते का वरण करना पड़ा। हालांकि सुसाइड नोट को फोरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है। शासन ने पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए एसआईटी गठित कर दी है। नोट के लिहाज से महंत को मानसिक प्रताड़ना देने वाले जिम्मेदार शिष्य आनंद गिरि सहित दो अन्य को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। मुकदमा भी पंजीकृत हो गया है। नोट में स्पष्ट तौर पर महंत ने लिखा है कि आनंद गिरि, आद्या प्रसाद तिवारी और उनके लड़के संदीप तिवारी ने मिलकर मेरे साथ विश्वासघात किया है। इस पूरे घटनाक्रम से एक बात स्पष्ट हो रही है कि जो नहीं होना चाहिए था वो हुआ लेकिन साथ ही एक प्रश्न भी उभर कर सामने आ रहा है कि समाज में कितने ही और भी ऐसे लोग हो सकते है जो ऐसी परिस्थितिजन्य हालातों से रोज-रोज दो-चार हो रहे है। इसकी पुनरावृत्ति को रोकने के संबंध में भी सरकारों को सोचना होगा। वरना इस संत की तरह कितने ही और ऐसे हालातों के शिकार होंगे।

 

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