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June 24, 2026
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राहुल को रास आने लगा यूपी!

By Shakti Prakash Shrivastva on June 19, 2024
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                                                                                                     शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

कहते है कि जीवन में एक परिणाम कभी-कभी लाभकारी निर्णायक फैसले करा देते हैं। ऐसा ही कुछ इन दिनों कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हो रहा है। वो राहुल जिन्होंने कांग्रेस को जनता की आक्सीजन दिलाने के लिए देश में एक सिरे से दूसरे सिरे तक की हजारों किलोमीटर की यात्राएं की। उत्तरप्रदेश से भी होकर उनकी न्याय यात्रा निकली लेकिन यात्रा की योजना से लेकर क्रियान्वयन तक में उन्होंने उत्तर प्रदेश को बहुत महत्व नहीं दिया। उसकी वजह ये थी राहुल गांधी पिछला लोकसभा चुनाव अपनी पुश्तैनी सीट अमेठी से बीजेपी की बाहरी प्रत्याशी स्मृति जुबिन ईरानी से हार गए थे। उत्तर प्रदेश में एक मात्र सीट पर कांग्रेस को पिछले 2019 के लोकसभा चुनाव में जो जीत मिली थी वो भी मात्र उनकी माँ सोनिया गांधी को। ऐसे में निराश होना लाजिमी है। सो राहुल उत्तर प्रदेश को लेकर बहुत आशान्वित नहीं लग रहे थे। क्योंकि एक बार सपा से गठबंधन कर दो लड़को की जोड़ी के रूप में खूब प्रसिद्धि पाई थी लेकिन वो प्रसिद्धि सीट के रूप में राहुल या कांग्रेस के खाते में नहीं आ पाई।

क्योंकि विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को महज दो सीटों से संतोष करना पड़ा था। वो भी दोनों ही सीटों की जीत में कांग्रेस पार्टी से अधिक उसमे उम्मीदवारों के व्यक्तिगत छवि का योगदान था। लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ एक बार फिर गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतरे कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता मिली। सत्रह सीटों पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस के छः उम्मीदवार चुनाव जीत गए। ऐसे में किसी का भी उत्साहित होना लाजिमी है। सो राहुल गांधी भी उत्साहित हुए। लेकिन उनका यह उत्साह देश को सर्वाधिक अस्सी सीटें देने वाले उत्तर प्रदेश में कितने दिनों तक बना रहेगा इसकी गारंटी नहीं है। हालांकि मौजूदा जातीय समीकरण आधारित सियासत में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच जो तालमेल लोकसभा चुनाव में दिखा उसका परिणाम भी सबके सामने है। 5 सीटों से संतोष करने वाली सपा को 37 और इकाई पर रहने वाली कांग्रेस को 6 सीटें मिली। इसमें कहीं कोई शक-सुबहा नहीं है कि यह जोड़ी ऐसी ही विधानसभा चुनाव तक बनी रहती है तो बीजेपी के लिए परेशानी का सबब बन सकती है। यही वो सब प्रामाणिक वजहे है जो राहुल गांधी को उत्तर प्रदेश में संभावनाएं दिखा रही है। उनको ऐसा लग रहा है कि वो उत्तर प्रदेश में समय देकर पार्टी को एकबार फिर अपने पुराने इतिहास की ओर ले जा सकते हैं।

ऐसी ही योजनाओं के मद्देनजर राहुल ने अपनी जीती हुई दो सीटों में से केरल की वायनाड़ सीट छोड़ते हुए राय बरेली सीट बरकरार रखने का निर्णय लिया है। वायनाड़ से उन्होंने अपनी बहन प्रियंका गांधी की उम्मीदवारी तय कर दी है। राहुल गांधी अब अपना सियासी सफर उत्तर प्रदेश को केंद्र में रखकर तय करेंगे। 2019 लोकसभा चुनाव के पहले जब से प्रियंका गांधी ने सक्रिय राजनीती में कदम रखते हुए उत्तर प्रदेश की सियासत में प्रदेश की  प्रभारी बनी थी। राहुल ने अपना ध्यान यहा से हटा लिया था। लेकिन अब एकबार राहुल अपने रणनीति में परिवर्तन कर रहे हैं। अभी तक उत्तर प्रदेश के पार्टी संगठन में कमोबेश वही चेहरे है जिन्हे प्रियंका गांधी लाई थी। अब यह तय है कि संगठन स्तर पर भी व्यापक फेरबदल होंगे। अब उनमे राहुल गांधी अपने मन मुताबिक चेहरों को लाएंगे।

प्रदेश में मौजूद सियासी रंग को देखते हुए राहुल के सियासी कौशल की परख सपा के साथ चुनावी तालमेल विधानसभा चुनाव तक बनाए रखने में होगी। हालांकि यह बहुत आसान नहीं है। क्योंकि समाजवादी पार्टी का जो जनाधार है वो उत्तर प्रदेश में ही है। यहाँ अगर कांग्रेस उसके सहारे आगे बढ़ती है तो कहीं न कही उसी के वोतबैंक में सेंध लगाएगी। अभी उत्तर प्रदेश में नौ-दस सीटों के लिए होने वाले विधानसभा उपचुनाव के बाबत जो बयान सपा की तरफ से आया है वो इसी की चुगली करता है। सपा ने साफ तौर पर कहा है कि उपचुनाव के लिए टिकटों के वितरण में कांग्रेस की हिस्सेदारी इस बात पर तय होगी कि वो महाराष्ट्र, हरियाणा और पश्चिम बंगाल में सपा के साथ कैसी हिस्सेदारी तय करती है। अगर उपचुनाव में सपा-कांग्रेस का तालमेल बन जाता है तो यह राहुल की पहली रणनीतिक विजय होगी। सपा के साथ अपनी सहजता बढ़ाने के लिए राहुल गांधी अपनी प्रदेश की टीम में पुराने चेहरों की भी वापसी कर सकते है जिनकी वजह से पार्टी को सपा के साथ तालमेल बनाए रखने में सहजता हो सके।

 

 

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