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बिहार राजनीति : महाराष्ट्र का ‘नाटक’ अब बिहार के मंच पर !

By Shakti Prakash Shrivastva on July 1, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

बिहार में पिछले कुछ दिनों से चल रहे सियासी घटनाक्रम इस बात की चुगली करते नजर आ रहे है कि जल्द ही महाराष्ट्र में सुर्खियां बटोरने वाले नाटक का मंचन बिहार में भी हो सकता है। क्योंकि ताजा घटनाक्रम में मुस्लिमों की पैरोकारी करने वाले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहाद उल मुस्लिमीन (AIMIM) के पांच में से चार विधायकों ने पार्टी से बगावत कर दिया है। सियासत में अमूमन राजनीतिक दलों के विधायक असन्तुष्ट हो पार्टी से बगावत कर सत्ताधारी दल से गठबंधन करते है क्योंकि वहाँ उन्हे लाभ की गुंजाइश रहती है। लेकिन ओवैसी के विधायकों ने ऐसा नही किया। उन्होंने सत्ता की बजाय राज्य की मुख्य विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से गलबहियाँ कर ली। इस घटनाक्रम से ऐसा लग रहा है कि राज्य के सियासी गलियारे में सब कुछ सामान्य नही है। राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के इस प्रभाव ने पटना से लेकर दिल्ली तक उथल-पुथल मचा दी है। इन विधायकों के आ जाने से अब आरजेडी विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। राज्य की सत्ता पर काबिज होने के लिए तेजस्वी यादव को अब महज 6 और विधायकों की दरकार है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आरजेडी इसका जुगाड़ भी समय पर कर लेगी। इन चार विधायकों के आने से आरजेडी महागठबंधन के पास 116 विधायक हो गए हैं। जबकि सत्ता पाने के लिए कुल122 विधायक चाहिए। लोकतंत्र में किसी राजनीतिक दल के विधायकों का दल बदलना कोई नई बात नहीं है लेकिन इतिहास में शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि जब किसी पार्टी के दो तिहाई विधायकों ने अपनी पार्टी छोड़कर मुख्य विपक्षी दल का दामन थामा है। अमूमन दल बदलने वाले विधायक सत्ता पक्ष के साथ ही जाते हैं क्योंकि इसके बदले में उन्हें सत्ता सुख हासिल होता है। लेकिन ओवैसी के इन चार विधायकों ने आरजेडी के साथ जाकर राजनीति में एक नई परंपरा की शुरुआत की है। इसके स्पष्ट निहितार्थ हैं कि आरजेडी की अगुवाई वाले महागठबंधन की सरकार बनने पर इन्हें मंत्री बनाने का आश्वासन दिया गया होगा क्योंकि राजनीति में बगैर किसी स्वार्थ के कोई इतना बड़ा फैसला नहीं लेता। राजनीति के जानकारों की मुताबिक ऐसा आभास हो रहा है कि राज्य में नीतीश सरकार के दिन ठीक नही चल रहे हैं। आने वाला समय महागठबंधन का ही है। संभवतः कुछ इस तरह के पुख्ता संकेत मिलने के बाद ही इन विधायकों ने इतना बड़ा सियासी जोखिम उठाया है। सियासी गलियारे में चर्चा इस बात की भी है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, एनडीए से अपना पिंड छुड़ाना चाहते है। साथ ही महागठबंधन में शामिल हो पुराने फार्मूले की तर्ज़ पर ही तेजस्वी को उप मुख्यमंत्री और अन्य नेताओं को प्रमुख विभागों का मंत्री बनाकर अपनी सरकार के बाकी बचे कार्यकाल को सुरक्षित करना चाहते हैं। नीतीश की ही तरह बीजेपी भी नीतीश से मुक्ति पाना चाहती है। इस तरह का संकेत जेडीयू से निष्काषित पार्टी प्रवक्ता अजय आलोक ने ट्वीट कर दिया है। उन्होंने सियासी उथल-पुथल पर कहा कि अभी तो खेल शुरू हुआ है। आलोक की मुताबिक इसका कंट्रोलिंग कहीं और है लेकिन ये नहीं बताया कि वह सिर्फ पटना तक ही सीमित है या फिर ‘दिल्ली दरबार’ उसका केंद्र है। मामला काफी हद तक महाराष्ट्र के घटनाक्रम से मेल खाता हुआ लग रहा है। और ऐसा हुआ तो फाइनल तस्वीर भी कुछ वैसी ही होगी। आलोक ने आरजेडी को बधाई भी दी है।

 

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