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April 30, 2026
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अपनों के निशाने पर योगी आदित्यनाथ?

By Shakti Prakash Shrivastva on January 25, 2026
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                                                         शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

देश की सियासत में सत्ता की राह जितनी सीधी दिखती है, अंदरूनी गलियारों में उतनी ही टेढ़ी भी होती है। इस जटिलता के उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को देखा जा सकता हैं। एक मजबूत प्रशासक, सख्त फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले और व्यापक जनसमर्थन वाले नेता के रूप में उनकी छवि है। लेकिन सियासत में ऐसा देखा गया है कि सबसे बड़ा खतरा विरोधियों से नहीं, बल्कि अपनों से ही पैदा होता है। ऐसे में यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या योगी आदित्यनाथ अपनों की साजिश का शिकार या उनके निशाने पर हो सकते हैं?

चूंकि सियासत में योगी आदित्यनाथ का उदय साधारण नहीं बल्कि असाधारण रहा है। गोरखपुर से सांसद रहते हुए उन्होंने मुखर हिंदुत्व की सियासत की और मुख्यमंत्री बनने के बाद कानून-व्यवस्था, माफिया नियंत्रण और प्रशासनिक सख्ती के जरिए अपनी एक अलग पहचान बनाई जो अन्य मुख्यमंत्रियों के लिए नजीर बनी। उनकी यही सख्ती और स्वतंत्र निर्णय लेने की शैली जहां उन्हें लोकप्रिय बनाती है, वहीं पार्टी और सत्ता तंत्र के भीतर असहजता भी पैदा करती है। सियासत में जब कोई नेता बहुत तेजी से मजबूत होता है, तो उसके आसपास ईर्ष्या, असंतोष और प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है।

भारतीय जनता पार्टी एक अनुशासित संगठन मानी जाती है, लेकिन यह भी सच है कि यहां सत्ता के कई केंद्र भी सक्रिय रहते हैं। जहां तक योगी आदित्यनाथ का संदर्भ है तो उनका कद सिर्फ एक मुख्यमंत्री तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि उन्हें केन्द्र की सियासत के संभावित चेहरे के रूप में भी देखा जाने लगा है। उनको लेकर मीडिया में सुर्खियां बनती खबरों पर गौर करें तो उनकी यही बात पार्टी के भीतर कुछ नेताओं को असहज करती है। आशंका यहीं से जन्म लेती है कि कहीं उनके फैसलों को लेकर अंदरूनी तौर पर माहौल उनके खिलाफ न बनाया जाए, या उनकी छवि को संतुलित करने के नाम पर उन्हें सीमित करने की कोशिश न हो।

इतिहास गवाह है कि देश की सियासत में कई मजबूत नेताओं को अपनों की साजिशों का सामना करना पड़ा है। सत्ता के गलियारों में रणनीति सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि नेतृत्व को नियंत्रित करने और भविष्य की दिशा तय करने तक फैली होती है। योगी आदित्यनाथ के मामले में भी कई बार यह चर्चा होती है कि उनके बुलडोजर नीति सरीखे कुछ फैसलों को अति सख्त बताकर भीतर ही भीतर सवालों के घेरे में लाया जाता है, जबकि वही फैसले जनता के एक बड़े वर्ग में उन्हें लोकप्रिय बनाते हैं।

हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि योगी आदित्यनाथ कोई राजनीतिक रूप से अनुभवहीन नेता नहीं हैं। नाथ संप्रदाय के प्रसिद्ध गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर की पृष्ठभूमि, संगठनात्मक अनुभव और जनाधार उन्हें आत्मविश्वास देता है। वे जानते हैं कि सियासत में संतुलन साधना उतना ही जरूरी है जितना दृढ़ता दिखाना। यही कारण है कि अब उनकी भाषा और रणनीति में पहले की तुलना में अधिक परिपक्वता दिखाई देती है।

अंततः यह कहना जल्दबाजी होगी कि योगी आदित्यनाथ निश्चित रूप से अपनों की साजिश का शिकार होंगे। लेकिन देश की मौजूदा सियासत की प्रकृति को देखते हुए इस संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती बाहरी विरोध नहीं, बल्कि अंदरूनी संतुलन बनाए रखने की है। अगर वे संगठन, सत्ता और जनसमर्थन—तीनों के बीच सामंजस्य साधने में सफल रहते हैं, तो न सिर्फ साजिशों से बच सकते हैं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में और मजबूत भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में कोई ताकत उनको निशाने पर रखते हुए भी उनका बहुत नुकसान करने की स्थिति में नहीं होगी।

 

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