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आध्यात्मिक विरासत को सहेजे योगी ने सजाया ‘दिव्य महाकुंभ’

By Shakti Prakash Shrivastva on February 4, 2025
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                                                                                            शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव
तीर्थराज प्रयागराज के गंगा-यमुना-सरस्वती नदियों के पावन संगम पर लगने वाला महाकुंभ भारतीय संस्कृति, आध्यात्म और परंपरा के अद्भुत आयोजन के रूप में पूरी दुनिया में आज प्रतिष्ठा पा चुका है। इस बार यानि 2025 में आयोजित यह महाकुंभ आयोजन 144 वर्षों के बाद हो रहा है। इसकी वजह से इसकी मान्यता अन्य की तुलना में कही अधिक मानी जा रही है। इसके अलावा आध्यात्मिक परिवेश से सियासी क्षेत्र में अपना परचम लहराने वाले शिव अवतारी गुरु गोरक्षनाथ की परंपरा के योगी, नाथ संप्रदाय के प्रतिष्ठित गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह से इस बार के महाकुंभ को दिव्यता-भव्यता दी है। वो देश-विदेश से पहुँचने वाले श्रद्धालुओं के लिए न भूतों-न भविष्यति जैसे आयोजन का अहसास कराती है। समूचे महाकुंभ परिक्षेत्र में सनातन संस्कृति के साथ-साथ तकनीकी विकास के मौजूदा स्वरूप का भी अद्भुत समन्वय स्पष्ट दिख रहा है। अगर यहाँ कल्पवासियों के लिए परंपरागत टेंट और नैसर्गिक वातावरण उपलब्ध है तो दूसरी तरफ अत्याधुनिक सुख-सुविधाओं से युक्त टेंट सिटी और डोम स्ट्रक्चर भी है।
ऐसी अनूठी व्यवस्था में जो भी श्रद्धालु पहुँच रहे है उनके श्रीमुख से एक बात अवश्य निकल् रही है जय हो योगी जी। उसका सीधा सपाट कारण है। कुम्भ अनादि काल से आयोजित हो रहा है। 7 वीं शताब्दी में भ्रमण पर भारत आए चीनी यात्री हवेनसांग की मुताबिक उस दौरान राजा हर्षवर्धन ने गंगा तट पर धर्म सभा का आयोजन किया था। मध्यकालीन इतिहास में 9 वीं से 18 वीं शताब्दी के बीच अखाड़ों द्वारा कुम्भ आयोजन के संदर्भ मिलते है। इस तरह हर छः साल पर अर्ध कुम्भ और बारह साल पर कुम्भ का आयोजन होता रहा है। बारहवें कुम्भ के आयोजन को महाकुंभ कहा जाता है। 2025 कुम्भ को महाकुंभ कहा गया क्योंकि यह 144 वर्षों बाद हो रहा है। लेकिन लगातार हो रहे आयोजनों में चमत्कारी बदलाव तब से देखने में आ रहा है जबसे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने है। क्योंकि कहा जाता है कि भाव का संबंध परालौकिक मान्यता देता है। पौराणिक कथाओं की मुताबिक समुद्र मंथन से जब पहले विष निकला तो उसे पीने का साहस देवताओं में भगवान शिव ने दिखाया था। उन्होंने ही उस विष का पान किया था। उसके बाद अमृत को लेकर देवताओं और असुरों में संघर्ष छिड़ गया। पुराणों में उल्लेख है कि 12 वर्षों तक चले इस संघर्ष में कुभ यानि घड़े से छलकी अमृत की बूंदें 12 स्थानों पर गिरी। इनमे 8 स्थान देवलोक में जबकि शेष 4 स्थान भारत के प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक है। इन्ही 4 स्थानों पर क्रमवार कुम्भ का आयोजन किया जाता है। शुरू में भगवान भोलेनाथ ने जिस तरह समुद्र मंथन के बाद विषपान कर इस अद्भुत धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन का मार्ग प्रशस्त किया। उसी तरह युगों-युगों बाद एक बार फिर उन्ही की परंपरा मतलब नाथ संप्रदाय के महंत योगी आदित्यनाथ की वजह से इसका स्वरूप भव्य से भव्यतम हो रहा है। 2017 में प्रदेश में योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने। इनके मुख्यमंत्री बनने के बाद 2019 में कुम्भ का आयोजन किया गया। इसके बाद से कुम्भ को लेकर योगी आदित्यनाथ ने यह तय कर लिया कि भारतीय समाज के सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक जागरण के प्रतीक इस आयोजन को संस्कार की सतह से अत्याधुनिकता की उड़ान के जरिए विश्वपटल पर परोसा जाए। अपने दृढ़ निश्चयी और हठधर्मी स्वभाव के चलते उन्होंने सरकारी तंत्र का बखूबी उपयोग किया और एक हद तक इस सपने को साकार भी किया। हालांकि महाकुंभ पर्व के अभी कई महत्वपूर्ण अमृत स्नान होने बाकी है। लेकिन अभी तक के अमृतस्नानों पर लगभग दस करोड़ से अधिक स्नानार्थियों के सकुशल स्नान कराने में सफल व्यवस्था को देख हर श्रद्धालु अन्य स्नानों के भी सकुशल सम्पन्न होने के प्रति आशान्वित है। इसके लिए श्रद्धालुओं को योगी आदित्यनाथ की मशीनरी पर अब भरोसा है। लगभग 4 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले महाकुंभ में 1800 हेक्टेयर में तो पार्किंग की व्यवस्था है। कल्पवासियों के लिए लगभग डेढ़ लाख से अधिक टेंट लगाए गए हैं। सुविधाजनक आवाजाही के लिए आसपास लगभग 4 सौ किलोमीटर अस्थायी सड़कें, 67000 से अधिक स्ट्रीट लाइटें लगाई गई है। सुरक्षा व्यवस्था के लिए 50 हजार से अधिक सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है। व्यवस्था को सुगम और जवाबदेह बनाने के लिए पूरे क्षेत्र को जिलास्तरीय ढांचा दिया गया है। पूरे क्षेत्र की ए आई संचालित सीसीटीवी कैमरों सहित डिजिटल निगरानी में रखा गया है। गंगा-यमुना…

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