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केशव पर फिर भारी पड़े योगी !

By Shakti Prakash Shrivastva on July 27, 2024
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                                                                              शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

भारतीय जनता पार्टी में पिछड़े वर्ग के नेता के तौर पर आज ठीक ठाक पहचान बना चुके केशव प्रसाद मौर्य की सियासी तस्वीर अब धूमिल होनी शुरू हो गई है। इसकी वजह खुद केशव हैं। कहते है जब एक परिपक्व इंसान अपने अनुभव की बजाय किन्ही कारणवश किसी तीसरे के निर्णय के अनुसार निर्णय करने लग जाता है तो उसका हश्र बुरा होता है। उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों केशव प्रसाद मौर्य के रूप में इसका उदाहरण साफ तौर पर देखा जा सकता है। दिल्ली के इशारे पर पहले लुके-छिपे और हाल में खुलकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ फ्रंट खोलने वाले सूबे के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को दिल्ली दरबार ने अचानक बैकफुट पर आने का निर्देश दे दिया है। जो केशव इस हालिया घटनाक्रम में यह मान कर चल रहे थे की इस बार मामला आर-पार का बन गया है। दिल्ली का आशीर्वाद प्राप्त होने की वजह से उन्हे यकीन हो चला था कि योगी के सत्ता से बेदखल होते ही मुझे पिछड़ा वर्ग के होने का लाभ मिलेगा और मुझे सूबे का मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। लेकिन उनका यह सपना एक बार फिर धरा का धरा रह गया। योगी आदित्यनाथ के दिल्ली आलाकमान से हुई मुलाकात के बाद शनिवार को बाजी पलट गई और उन्हे योगी आदित्यनाथ के सामने झुकना पड गया।

हालांकि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य के बीच की यह रार नई नहीं है बल्कि उस समय से है जबसे योगी मुख्यमंत्री बने है। 2017 में जब सूबे में पार्टी की बहुमत से सरकार बनने की स्थिति बनी तो बतौर पार्टी प्रदेश अध्यक्ष और पिछड़ा वर्ग के एक नामचीन चेहरा होने के चलते उनका नाम भी मुख्यमंत्री के रेस में था। लेकिन सूत्रों से मिली जानकारी पर यकीन करे तो अचानक संघ की मंशानुरूप न चाहते हुए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को गोरक्ष पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाना पड़ा। उस समय मोदी तो नहीं लेकिन अमित शाह ने केशव की महत्वाकांक्षा को पढ़ लिया और उसने अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही केशव के कंधे पर अपना सियासी हाथ मजबूती से रख दिया। फिर क्या था गाहे-बेगाहे केशव के व्यवहार से मीडिया में यह सुर्खियां बनने लगी कि योगी और केशव में कुछ तल्खी है। लेकिन यह सब लुके छिपे था लिहाजा सियासी गलियारे में गूंज कर यह कयास दम तोड़ देता था। लेकिन जब पिछले विधानसभा चुनाव में केशव प्रसाद मौर्य अपना ही चुनाव हार गए और हारने के बावजूद उन्हे उनकी कुर्सी बरकरार रहने दी गई। तब काफी हद तक छिपा मामला खुल गया कि ऐसा योगी पर नकेल लगाने के लिए किया जा रहा है। हालिया सम्पन्न लोकसभा चुनाव में जब यूपी में पार्टी की सीटे कम आई तो दिल्ली लाबी ने अपने भविष्य के लिए केशव के रूप में सात साल से पाले जा रहे सियासी टूल को आगे कर फ्रंट खोलने का निर्णय लिया। केशव के लिए मोहरा बन लेफ्ट-राइट करने के अलावा कोई चारा नहीं था लिहाजा वो दिल्ली के इशारे पर पहले तो सरकार से बड़ा संगठन का बयान दे योगी को मुंह चिढ़ाया बाद में उनके बुलाए बैठकों का बहिष्कार किया। इतना ही नहीं कैबिनेट की बैठक बुलाने का भी दुस्साहस किया। कुछ असन्तुष्ट पार्टी कार्यकर्ताओं को भी योगी के खिलाफ उकसाने की कोशिश की। ऐसा लगने लगा कि केशव का यह दुस्साहस बेवजह नहीं है। बिना ठोस आश्वासन के ऐसा केशव हरगिज करनेवाले नेता नहीं है। लेकिन अब चूंकि कर चुके थे। फ्रंट ओपन हो चुका था। अब निर्णय आर-पार की होनी थी। लेकिन कहते है सियासत में जब पार्टी को अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगता है तो वो अपने किसी भी निर्णय को पलट देती है और किसी भी नेता की बलि लेने से भी नहीं हिचकती। इस बार केशव के साथ ऐसा ही हुआ। पार्टी को लगा कि योगी के तेवर से पार्टी को नुकसान हो सकता है तो फिर उसने अपने ही मोहरे को पीटने का निर्णय लिया। मिल रही जानकारी की मुताबिक केशव को संयमित रहते हुए शांति से काम करने की सलाह दी गई है। इस तरह पिछले सात साल से हर फ्रंट पर मात खाने वाले केशव को योगी से एक बार फिर मात मिल गई है। देखना है कि अब केशव का रुख क्या होता है।

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