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October 13, 2026
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यूपी में बिछी गठबंधन और जातीय गणित वाली सियासी बिसात!

By Shakti Prakash Shrivastva on October 13, 2026
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश की सियासत में विधानसभा चुनाव की तैयारी अब केवल सत्ता और विपक्ष की बयानबाजी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे गठबंधन की गांठें खोलने, जातीय समीकरण साधने और अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने जैसी कवायद भी है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ते यूपी में हर राजनीतिक दल के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि उसके साथ कौन आएगा, किसे कितनी हिस्सेदारी मिलेगी और किन समुदायों के बीच उसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी। यहां चुनावी बिसात पर मोहरे केवल दलों के नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के भी हैं।
समाजवादी पार्टी के लिए PDA यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को साथ लाने की रणनीति महत्वपूर्ण है। अखिलेश यादव इस सामाजिक गठजोड़ को भाजपा के व्यापक चुनावी आधार के मुकाबले एक विकल्प के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। लेकिन इस रणनीति की असली परीक्षा केवल नारों से नहीं, बल्कि टिकट वितरण, संगठन में भागीदारी और विभिन्न समुदायों के स्थानीय नेतृत्व को सम्मान देने से होगी। सवाल यह भी है कि क्या अलग-अलग सामाजिक समूहों की अपेक्षाओं को एक साझा राजनीतिक एजेंडे में बदला जा सकेगा?
दूसरी ओर भाजपा के सामने अपने मौजूदा सामाजिक समर्थन को बनाए रखने के साथ गैर-यादव पिछड़ी जातियों, गैर-जाटव दलितों और अन्य वर्गों के बीच संगठनात्मक पकड़ कायम रखने की चुनौती है। पार्टी के लिए हिंदुत्व, विकास, कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाएं राजनीतिक विमर्श के प्रमुख आधार हैं। इसके साथ टिकट वितरण और स्थानीय नेतृत्व का चयन भी अहम होगा। कांग्रेस की भूमिका भी इस सियासी मुद्दे पर महत्वपूर्ण होती जा रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने मिलकर उत्तर प्रदेश की 80 में से 43 सीटें जीती थीं। इसी अनुभव के आधार पर दोनों दल 2027 में भी साथ रहने की बात कर रहे हैं, लेकिन सीटों के बंटवारे और राजनीतिक हिस्सेदारी को लेकर दबाव की राजनीति सामने आ रही है। हालांकि छोटे दलों की सक्रियता ने इस बातचीत को और जटिल बना दिया है।
बहुजन समाज पार्टी और मायावती की रणनीति भी इस समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बसपा का पारंपरिक दलित आधार, उसका स्वतंत्र चुनाव लड़ने का रुख और विभिन्न सीटों पर उम्मीदवारों का चयन चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह निषाद, राजभर, कुर्मी, मौर्य, चौहान और अन्य पिछड़े समुदायों के बीच सक्रिय क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं।
आखिरकार, 2027 की सियासी बिसात पर गठबंधन की मजबूती, सीटों का बंटवारा, सामाजिक प्रतिनिधित्व और जनता के मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे। दलों के लिए चुनौती केवल जातीय गणित बैठाने की नहीं, बल्कि अलग-अलग अपेक्षाओं को एक साझा राजनीतिक कार्यक्रम में बदलने की भी है। सवाल यह नहीं कि किस दल के पास कितने जातीय समीकरण हैं, बल्कि यह है कि कौन-सा राजनीतिक गठजोड़ अपने वादों, संगठन और जनसरोकारों के बीच भरोसेमंद तालमेल स्थापित कर पाता है। यही उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति की असली परीक्षा होगी।

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