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इंसेफेलाइटिस से उबरे तो अब डराने लगा डाइबिटीज!

By Shakti Prakash Shrivastva on July 11, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

            उत्तर प्रदेश में खासकर पूर्वाञ्चल के इलाके में लगभग तीन दशकों से भी अधिक समय तक इंसेफेलाइटिस ने अपना कहर बरपाया। लाखों नौनिहालों को इस बीमारी ने असमय काल के गाल में खींच लिया। लेकिन प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने खासकर योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद  इसका उन्मूलन सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बन गया। जो बिमारी लगभग लाइलाज बन हर साल कई हजार बच्चों की जिंदगी खत्म कर रही थी। वही सरकार के प्रयास से आज एकदम समाप्त हो गई है। आज एक भी बच्चे की मौत इंसेफेलाइटिस से होने की खबर नहीं आती है। ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि लगभग दो दशकों से भी अधिक समय तक योगी आदित्यनाथ ने बतौर जिम्मेदार सांसद इस बीमारी को बहुत नजदीक से देखा है। लेकिन अवसर न मिलने के नाते मजबूर रहे। जैसे ही उन्हे अवसर मिला उन्होंने इस असंभव कृत्य को संभव कर दिखाया। लेकिन अब प्रदेश को एक दूसरी बिमारी डराने लगी है। यह बीमारी है डाइबिटीज। इस प्री डाइबिटीज बीमारी के मरीजों की संख्या अन्य राज्यों की अपेक्षा उत्तर प्रदेश में तेजी से बढ़ रही है। इसका खुलासा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान की एक रिपोर्ट से हुआ है। इस बिमारी की राष्ट्रीय स्तर पर औसत 15.3 फीसदी हैं। जबकि उत्तर प्रदेश में यह 18 फीसदी का आंकड़ा पार कर गया है। यह आंकड़ा एक एलार्म है यहाँ के लोगों और सरकार दोनों को सचेत करने के लिए। इसलिए अब सरकार को भी इस बाबत हर संभव प्रयास करने होंगे साथ ही लोगों को भी पहले की अपेक्षा इस बिमारी के प्रति सजगता बढानी होगी।

चिकित्सा विशेषज्ञों की मुताबिक जिन लोगों में एचबीए1सी का स्तर 5.5 से अधिक है उन्हें तत्काल किसी सक्षम चिकित्सक से परामर्श ले उपचार शुरू कर देना चाहिए। एचबीए1सी खून से की जाने वाली ऐसी जांच पद्धति है जिसमें मरीज के तीन महीने का औसत डाइबिटीज रिकार्ड पता चलता है। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च यानि आईसीएमआर की ओर से कराए गए एक स्टडी में उत्तर प्रदेश में डाइबिटीज का प्रसार 4.8 फीसदी पाया गया है जो अन्य राज्यों की अपेक्षा कम है। लेकिन डाइबिटीज के प्रारंभिक यानि प्री-डायबिटिक मरीजों की संख्या आबादी के लगभग 18 फीसदी है। जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 15.3 फीसदी है। ऐसे में ये मरीज साल से दो साल के अंदर डाइबिटीज रोगी हो सकते हैं। यानी राज्य पर ऐसे मरीजों का भार तेजी से बढ़ेगा। लखनऊ स्थित किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी यानि केजीएमयू के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. कौसर उस्मान की मुताबिक डाइबिटीज के प्रारंभिक मरीजों में कुछ समय बाद करीब एक तिहाई डाइबिटीज के मरीज हो जाते हैं। उन मरीजों को डाइबिटीज के प्रारंभिक या प्री डाइबिटीज मरीज माना जाता है जिनके रक्त में शुगर लेवल सामान्य से ज्यादा है पर इतना ज्यादा नहीं है कि उन्हें डाइबिटीज की श्रेणी में रखा जाए। जिन लोगों का शुगर लेवल खाना खाने के पहले 100 से 126 और खाना खाने के बाद 140 से 200 (एमजी-डीएल) के स्तर पर रहता है और एचबीए1सी 5.5 से 6.5 फीसदी के बीच हैं उन्हें सावधान हो जाना चाहिए। ऐसी रिपोर्ट पर मरीज को तत्काल चिकित्सकीय परामर्श लेनी चाहिए। खानपान का ध्यान रखकर डाइबिटीज रोगी होने की गति को रोका जा सकता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों की मुताबिक प्रारंभिक डाइबिटीज के स्तर पर ही डाइबिटीज की तरह सावधानी बरती जाए तो इसे नियंत्रित किया जा सकता है। प्रारंभिक स्तर का पता लगते ही चिकित्सकीय सलाह से दवा शुरू कर दें। मोटापा हर हाल में कम करें। खुद को सक्रिय रखें। कम से कम 30 मिनट तेज गति से टहलें और योग करें। मरीज को खाने में शक्कर की मात्रा कम कर सब्जियों, फलों और साबूत अनाज बढ़ा देना चाहिए। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा के संतुलित अनुपात का ध्यान रखें। चिकित्सक की सलाह पर रक्त शर्करा स्तर आदि की जांच करते रहे। अपनी मर्जी से दवा बंद न करें। तनाव न लें। सरकार अगर इस स्थिति में गंभीर प्रयास शुरू कर दे तो इसे इंसेफेलाइटिस की तरह भयावह स्थिति में पहुँचने से पहले ही रोका जा सकता है

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