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गोरखपुर का मनीष ‘मर्डर’ केस : पुलिस रिफ़ार्म की कहानी लिखेगा!

By Shakti Prakash Shrivastva on September 30, 2021
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

आपराधिक घटनाओं में अपने को फँसता देख पुलिस किस-किस तरह के हथकंडे अपनाती है कैसी-कैसी कहानियाँ गढ़ती है ये किसी से छुपा नहीं है। गोरखपुर में कानपुर के प्रापर्टी डीलर मनीष गुप्ता की मौत मामले में भी जब पुलिस की पिटाई के बाद मनीष की मौत हो गयी तब एक बार फिर पुलिस ने वही पुराना हथकंडा अपनाया। कहानी गढ़ी, फौरी तौर पर मौत होने का सीन क्रिएट किया और अपने आला अधिकारियों को भी गढ़ी हुई स्क्रिप्ट थमा दी। वरिष्ठ और अनुभवी पुलिस अधिकारियों ने भी हमेशा की तरह पुलिस की खाकी दागदार न हो इस बाबत मिली कहानी को आगे राजधानी बैठे अपने आला हाकिमों तक पहुंचा दिया। शीर्ष हाकिम ने भी ठसके से मीडिया को रटा-रटाया कहानी सुना दी कि जांच में सहयोग की बजाय मनीष भागा और हड़बड़ाहट में गिरकर चोटिल हो गया। पुलिस इलाज के लिए अस्पताल ले गयी जहां इलाज के वक्त उसकी मौत हो गयी। पुरानी घटनाओं की भांति इस बार भी सच्चाई के पर्दाफाशी सबूत मिल ही गए। हालांकि होटल स्टाफ और पुलिस ने बड़ी सफाई से खून के दाग-धब्बे मिटा डाले थे लेकिन पोंछे में इस्तेमाल तौलिये को बाहर फेंकने की बजाय बेड के नीचे छुपा दिये। चूंकि होनी को उसका मिलना मंजूर था लिहाजा मनीष की पत्नी सामान लेने होटल के कमरे पहुंची तो उसे तौलिया मिल गया। उसने यह साक्ष्य पुलिस को सौंपा है। मुख्यमंत्री के गृह जनपद की पुलिस द्वारा जो कुछ भी किया गया वो पूर्व की अन्य घटनाओं से लेश मात्र भी जुदा नहीं था। सिर्फ कुछ अलग था तो वो सरकार के रूप में एक सख्त और अलग किस्म की राजनीतिक शख्सियत रखने वाला योगी आदित्यनाथ की सरकार का होना। बस इसी अलग हुई स्थिति ने इस पूरे प्रकरण को आम से खास बना दिया। गृह जनपद का मामला होने के नाते और अपने अलग स्वभाव के नाते मुख्यमंत्री योगी ने जो कुछ इस मामले मे किया वो प्रदेश में पुलिस अधिकारियों की तैनाती में बरती जाने वाली भ्रष्टाचारी व्यवस्था के आमूल-चूल दुरुस्ती की शुरुआत का स्पष्ट संकेत देता है। योगी आदित्यनाथ ने मनीष की पत्नी से मुलाक़ात के बाद जिस तरह के आदेश पुलिस के लिए दिये वो आने वाले दिनों में प्रदेश की आम-अवाम को राहत पहुंचाने वाला साबित होगा। मुख्यमंत्री ने सख्त निर्देश दिये है कि लगातार पुलिस अधिकारियों से संबन्धित इस तरह की घटनाए को देखते हुए अब ट्रैक रिकार्ड की तफतीश के बाद ही फील्ड में अधिकारियों की तैनाती दी जाये। ट्रैक रिकार्ड की जांच मेंभी स्पष्ट पारदर्शिता रखी जाये। इसमें कोई भी दोषी पाया गया तो सख्त दंड का भागीदार होगा। हालांकि मुख्यमंत्री के इस आदेश के पूर्व से ही विभाग में अधिकारियों की तैनाती के बाबत इस तरह के स्पष्ट निर्देश है। लेकिन भ्रष्ट नौकरशाही के मकड़जाल से घिरी व्यवस्था में जमीन पर व्यवस्था का यह रूप देखने को नहीं मिलता। चूंकि इस बार आदेश महज एक मुख्यमंत्री द्वारा नहीं दिये गए है बल्कि यह योगी आदित्यनाथ सरीखे सख्त और आदेशो के क्रियान्वयन को स्वयं के चश्में से देखने वाले मुख्यमंत्री द्वारा दिये गए है। पुलिस जैसा भ्रष्ट विभाग भी मुख्यमंत्री योगी की इस मंशा और तेवर को इस बार स्पष्ट भाँप चुकी है। लिहाजा ऐसा लगता है कि इस बार न केवल इस व्यवस्था को जमीन पर उतारने की जमीनी प्रयास भी किए जाएँगे। बल्कि कुछ दागदार अधिकारियों की बलि भी चढ़ सकती है। पुलिस अधिकारियों से जुड़े मामले जितना भी है चाहे महोबा के पुलिस कप्तान आई पी एस मनीलाल पाटीदार का मामला हो या पुलिसिया लीपापोती की कार्रवाई वाली देवरिया संवासिनी गृह का चर्चित मामला हो सभी की नयी सिरे से जांच हो सकती है। उत्तर प्रदेश के अन्य चर्चित मामलो की बात करे तो जौनपुर जिले में बक्शा थाना क्षेत्र के चकमिर्जापुर निवासी कृष्णा यादव उर्फ पुजारी (25) की 11 फरवरी की रात थाने में पुलिस की पिटाई से मौत हो गई थी। आरोप पुलिस पर आरोप लगा। अंबेडकरनगर जिले में आजमगढ़ के जियाउद्दीन की पुलिस कस्टडी में मौत हुई। आरोप है कि पुलिस की पिटाई से युवक की मौत हुई। उन्नाव में 22 मई को कोरोना कर्फ्यू के दौरान ठेले पर आलू बेच रहे सब्जी विक्रेता को पुलिस पकड़कर कोतवाली ले गई थी। वही उसकी मौत हो गयी। सुल्तानपुर में 3 जून को कुड़वार थाना परिसर के पुलिस लॉकप में कुड़वार थाना क्षेत्र के परसीपुर निवासी राजेश कोरी की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। झाँसी में अक्टूबर 2019 में एक युवक पुष्पेंद्र को पुलिस पकड़ कर थाने लायी। अगली सुबह पुलिस ने गुरसराय थाना क्षेत्र में एक मुठभेड़ में उसे मार गिराया। लखनऊ में एपल कंपनी के अधिकारी विवेक को पुलिसकर्मी ने गोली मार कर मौत की नींद सुला दिया। इस तरह कथित पुलिसिया इकबाल की अनेकानेक कहानियाँ हैं। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली से वाकिफ लोगों को इस बात का पूरा यकीन है कि गोरखपुर का मनीष हत्याकांड कहीं न कहीं प्रदेश में पुलिसिया अधिकारियों की कार्य संस्कृति को बदलने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। इस प्रकरण की बात करें तो मनीष के परिजन की मांग की मुताबिक आरोपी 3 नामजद और 3 अज्ञात पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा पंजीकृत कर केस को कानपुर स्थानांतरित किए जाने की कार्रवाई हो गयी है। सभी आरोपी निलंबित कर दिये गए है। मनीष के परिजनों से बातचीत के दौरान जिस तरह जिले के जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान द्वारा मामले को सुलझाने के रास्ते सुझाने संबंधी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे है उससे ऐसा लगता है कि इन पर भी कुछ कार्रवाई हो सकती है। कानपुर में मनीष के परिजनों से सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी मुलाक़ात कर 20 लाख की आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया गया है। सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर स्थानीय विधायक ने आर्थिक सहायता रूपी 10 लाख का चेक मनीष की पत्नी को सौंपा है। सरकार द्वारा मनीष की पत्नी को नौकरी दिये जाने का आश्वासन भी दिया गया है। फिलहाल महज 8 साल के वैवाहिक जीवन को इस घटना से लगे ग्रहण की शिकार मनीष की पत्नी व परिजन सरकार खासकर मुख्यमंत्री योगी की फौरी और अपेक्षित सम्मान और सहयोग से संतुष्ट है।

 

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