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लोकपाल या शौकपाल!

By Shakti Prakash Shrivastva on October 27, 2025
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                                                                             शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

दिल्ली में अन्ना आंदोलन से सुर्खियों में आया लोकपाल शब्द इन दिनों फिर सुर्खियों में है। देश में भ्रष्टाचार पर नजर रखने के लिए अस्तित्व में आई यह संस्था अब अपने सात लक्जरी बीएमडब्ल्यू कारों की खरीद के लिए निकाले गए टेंडर की वजह से सुर्खियों में है। इन कारों की कीमत लगभग पाँच करोड़ रुपया बताई जा रही है। लोकपाल के लिए कारे खरीद के इस टेंडर को लेकर देश में सियासत तेज हो गई है। विपक्ष सरकार पर हमलावर हो गया है। सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए विपक्ष का मानना है कि लोकपाल अब शौकपाल हो गया है।

पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए इस मामले की शुरुआत कैसे हुई जानना होगा। मामला तब शुरू हुआ जब 16 अक्टूबर को एक टेंडर जारी हुआ। टेंडर में बीएमडब्ल्यू तीन सीरीज 330 एलआईएम स्पोर्ट (सफेद रंग) की सात गाड़ियों की डिमांड की गई। इन गाड़ियों में प्रत्येक गाड़ी की कीमत लगभग 70 लाख है। इस तरह सातों गाड़ियों की कीमत लगभग पाँच करोड़ है। ये सभी गाड़ियां लोकपाल के चेयरमैन जस्टिस ए एम खानविलकर (रिटायर्ड) और अन्य छः सदस्यों के लिए खरीदी जानी है। इस टेंडर की जानकारी होते ही विपक्षी दलों को मसाला मिल गया। इस मामले में सर्वाधिक मुखर देश की प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस हुई। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सवाल उठाते हुए कहा कि ऐसा करने वाले वो लोग हैं जो मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ झूठा प्रचार किया करते थे। ऐसे लोगों को इस मामले के बाद लोकपाल की असलियत समझ जानी चाहिए। ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ मामलों को देखने वालों को ऐसी लक्सजरी गाड़ियों की आवश्यकता क्यों पड़ी।

कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने तो बाकायदा सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों को मिल रही सुविधाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट के सिटिङ जजों को मामूली कारें मिलती है तो फिर लोकपाल के रिटायर्ड जजों को इतनी महंगी लक्जरीयस गाड़ियों की जरूरत क्यों ? श्री चिदंबरम का यह तर्क जायज है कि सरकार इस तरह के भेद क्यों कर रही है। अगर जजों को मिल रही सुविधाओं को बढ़ाने की मंशा अगर सरकार की है तो उचित है। लेकिन इसके लिए बाकायदा एक नीति बननी चाहिए, जो कि पहले से है भी। ऐसा क्यों किया जा रहा है वो समझ से परे हैं। कांग्रेस नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भी इस मामले पर तंज कसा है। उन्होंने लोकपाल की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुए कहा कि जिस लोकपाल में 8703 शिकायतें हो और जाँचे सिर्फ 24 हों। यही नहीं मात्र 6 की संख्या में अभियोजन स्वीकृति हो तो ऐसे में इस लोकपाल संस्था के सदस्यों को इतनी सुविधाये क्यों। प्रथम दृष्ट्या कांग्रेसी नेताओं द्वारा उठाए गए सवाल वाजिब लगते है। अगर सरकार के पास इस बाबत इससे इतर कोई तर्क हो तो निःसंदेह उसे भी पब्लिक फोरम पर रखना चाहिए। जरूरी नहीं कि जो सवाल उठाए जा रहे हो वो ही सही है। लेकिन अगर गलत है तो उसकी जानकारी भी होनी चाहिए।

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