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ऐसे तो योगी नहीं बीजेपी ही निबट जाएगी !

By Shakti Prakash Shrivastva on July 25, 2024
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                                                                                                शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश बीजेपी में इन दिनों जो कुछ घटनाक्रम हो रहा है वो किसी से छुपा नहीं है। उसे देखकर ऐसा लगता है कि बीजेपी का स्वर्णिम काल बीत गया है। अब वो अपने अंत की ओर बढ़ चली है। क्योंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर पार्टी अध्यक्ष भूपेन्द्र चौधरी, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक, पूर्व कैबिनेट मंत्री फतह बहादुर सिंह, राज्यमंत्र दिनेश खटिक, बीजेपी की सहयोगी अपना दल एस सुप्रीमो अनुप्रिया पटेल, निषाद पार्टी प्रमुख डॉ संजय निषाद, उनके बेटे और चौरीचौरा के विधायक सरवन निषाद, सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर सहित पार्टी के कई छोटे-बड़े नेता-कार्यकर्ता जिस तरह से व्ययहार कर रहे है वो प्रदेश सरकार ही नहीं बीजेपी के लिए भी ठीक नहीं है।

दरअसल बीजेपी का आलाकमान शुरू से ही मन से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ नहीं रहा। उसकी भी वाजिब वजह थी। 2017 में जब प्रदेश में बीजेपी सत्ता में आई तो बतौर मुख्यमंत्री गाजीपुर के मनोज सिन्हा उसकी पसंद थे लेकिन संघ के दबाव के चलते ऐन वक्त पर मनोज सिन्हा को किनारे कर उनकी जगह योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बना दिया गया। यह टीस आलाकमान खासकर अमित शाह, नरेंद्र मोदी और जे पी नाड़ा के जेहन में बनी रही। समय-समय पर यह टीस कार्य-व्यवहार में भी झलकती रही। प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात आईएएस अधिकारी ए के शर्मा की सियासी पारी का मामला हो या सहयोगी दलों के समायोजन का सभी जगह पर योगी आदित्यनाथ ने अपनी शर्तों पर अपने ढंग से काम किया। आलाकमान का दबाव माना भी लेकिन अपने अंदाज में। इस तरह लुका-छिपी की यह सियासत पिछले सात सालों से लखनऊ और दिल्ली के बीच चल रहा है। अब जबकि बीते लोक्सभा चुनाव परिणाम मे बीजेपी को प्रदेश में अनापेक्षित जनादेश मिला तो उसका ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाए इसको लेकर पार्टी के अंदर मंथन होने लगी। पहले तो मुखिया योगी आदित्यनाथ के सिर को आगे करने की कोशिश की गई लेकिन सूत्र बताते हैं कि योगी ने साफतौर पर टिकट वितरण से लगायत नीति  निर्धारण तक में स्वयं को अलग रखें जाने की वजह से जिम्मेदारी लेने से साफ इनकार कर दिया। इसके बाद दिल्ली दरबार के गुजराती लाबी से एक गलती हो गई। लाबी ने लुक-छिप कर चल रहे इस सियासी खेल को खुलकर खेलने का संकेत अपने सूबाई क्षत्रपो को दे दी। बिना यह अंदाजा लगाए कि इसका दूरगामी परिणाम योगी की बजाय पार्टी के भविष्य पर पड़ेगा। अभी पार्टी को अपनी पराजय की समीक्षा कर उसे दुरुदत करते हुए आगे की तैयारी करनी चाहिए ऐसे में यह साजिश जैसी हरकते पार्टी के भविष्य के लिए कततई शुभ नहीं दिखते।

बहरहाल पिछले पखवारे लखनऊ कार्यसमिति की समीक्षा बैठक के बाद योगी को नापसंद करने वाले उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने एक बयान दिया कि सरकार से बड़ा होता है संगठन। इसके बाद दिल्ली जाकर अध्यक्ष नड़ड़ा से गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलना फिर वहाँ से वापस आकर मुख्यमंत्री के अधीनस्थ विभाग कार्मिक के अपर मुख्य सचिव को पत्र लिखकर पूछना कि 2017 के बाद से हुई नियुक्तियों में आरक्षण का ध्यान रखा गया कि नहीं। इस दौरान मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई मीटिंग में दोनों उपमुख्यमंत्रियों का न जाना और उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य द्वारा असंवैधानिक तरीके से कैबिनेट की मीटिंग बुलाना जैसे कार्यव्यवहार इस बात के संकेत देते है कि अब बीजेपी का अंदरूनी ढांचा पूरी तरह अराजक हो चला है। यदि ऐसा नहीं होता तो क्या इन स्थितियों पर समबंधितों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाइयाँ नहीं होती। लेकिन चूंकि ये सभी आलाकमान के इशारे पर ही हो रहा है लिहाजा कोई कार्रवाई भी नहीं हो रही है।

जबकि योगी आदित्यनाथ को सीधे तौर पर निपटाने की हसरत पालने वालों को इस बात का जरा भी भान नहीं है कि योगी की लोकप्रियता आज क्या है। आज उनके खिलाफ की गई किसी कार्रवाई का परिणाम योगी आदित्यनाथ की बजाय पार्टी को भुगतना पड़ेगा। संभव है कि घटनाक्रम पार्टी के भविष्य पर ग्रहण साबित हो। यह सच्चाई है कि समय रहते यदि इन क्रियाकलापों पर अंकुश नही लगाया गया तो प्रदेश में होने वाला दस विधानसभा सीटों का उपचुनाव बीजेपी के भविष्य की इबारत लिख देगा।

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