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October 9, 2026
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यूपी की सियासत में अब दलित-दलित..  

By Shakti Prakash Shrivastva on July 13, 2024
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                                                                                  शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से उत्तर प्रदेश की सियासत में एक नया सियासी फार्मूला बनते दिख रहा है। नतीजों में विपक्षी दलों के गठबंधन आइएनडीआइए खासकर समाजवादी पार्टी की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण साबित हुई। चुनाव से पहले ही जिस तरह से समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पीडीए नाम का पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों को साधने वाला सियासी समीकरण बनाकर एक प्रयोग शुरू किया। उसका सधा सधाया निशाना सीधे उनके लक्ष्य तक जा पहुंचा। इसका फायदा सपा को प्रदेश में लोकसभा सीटों की संख्या में इजाफे के रूप में हुआ। पिछले बार की तुलना में उसे 28 सीटों का फायदा हुआ। इस पीडीए में भी सर्वाधिक चर्चा दलित मतों की हुई क्योंकि दलितों की सबसे बड़ी ठीकेदार रही बीएसपी की प्रदेश में साख लगभग समाप्तप्राय है। ऐसे में क्या सपा, क्या बीजेपी बल्कि कांग्रेस भी बीएसपी के ऐसे कैडर वोटों को लपकने के लिए दलित-दलित का माला जपना शुरू कर दिए हैं।

समाजवादी पार्टी तो चुनाव के पहले से ही दलित के साथ-साथ पिछड़ा और अल्पसंख्यकों को पीडीए के नाम पर एकजुट कर बाजिमारू की भूमिका में आ गई थी। बाद में कांग्रेस ने भी दलितों को साधने की मुहिम शुरू की। इसके लिए उसने बाकायदे 6 जुलाई को देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री स्व. जगजीवन राम की पुण्यतिथि के ही दिन आयोजन कर इस मुहिम की शुरुआत भी कर दी है। यहाँ तक कि प्रदेश में लगातार दो बार से सत्ता पर काबिज बीजेपी ने भी यह तय किया है कि वो भी दलित लुभावने कार्यक्रमों का आयोजन करेगी। बीएसपी जो दलित हितैषी होने की मलाई सत्ता सुख के रूप में कई बार चख चुकी है वो भी अपने बिखर रहे वोटबैंक को फिर से सहेजने की जुगत में लग गई है। इस तरह यूपी की सियासत में इन दिनों ऐसा लग रहा है कि बस सियासी दल सोते-जागते दलित-दलित ही सोच रहे हैं।

समाजवादी पार्टी को बीते लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता मिली है। उसे इस बात का बखूबी एहसास है कि प्राप्त सुख में बहुत बड़ा योगदान इस दलित हितैषी पीडीए मुहिम का रहा है। बीजेपी के खिलाफ एंटी इन्कमबेनसी और आरक्षण का भय सहित बीएसपी का अचंभित करने वाला  सियासी रुख तथा कांग्रेस के नए सिरे से संभलने जैसी स्थिति का भी भरपूर फायदा समाजवादी पार्टी को मिला। बीजेपी ने भी यूपी में मिली अनापेक्षित शिकस्त के बाद किए गए समीक्षा में यह माना कि अब दलितों को साधने के लिए नए सिरे से मुहिम चलाना होगा। पिछले दिनों लखनऊ स्थित बीजेपी प्रदेश मुख्यालय में सम्पन्न पदाधिकारियों की समीक्षा बैठक में लोकसभा चुनाव में मिली हार के कारणों में सबसे बड़ी बाधाओं में एक बाधा दलित वोटों की रुचि में कमी माना गया। यही वजह है कि जातीय समीकरणों के साधने के लिए सत्ता में हिस्सेदारी कर रहे निषाद पार्टी का भी पर्फार्मेंस चुनाव में बहुत उत्साहित करने सरीखा नहीं रहा। लिहाजा दलित वोटों को सहेजने के लिए सरकार के मुखिया समेत संगठन की टीम ने भी आवश्यकता जताई है। संगठन ने भी माना कि पिछले चुनाव में ऐसा अनुभव हुआ है कि अगर किसी क्षेत्र में मनपसंद प्रत्याशी नहीं मिला तो संगठन के लोगों ने विरोध तो नहीं करते पर जीत के लिए मन से जुटे भी नहीं। इसमें सुधार करना होगा।

इसके लिए बीजेपी ने अब दलितों को जोड़ने के लिए एक बड़ा प्लान तैयार किया है। लखनऊ स्थित बीजेपी मुख्यालय मे आयोजित इस बैठक में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उपमुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य, बृजेश पाठक, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह, राष्ट्रीय संगठन मंत्री बी एल संतोष की मौजूदगी में यह निर्णय लिया गया कि प्रदेश में होने वाले 10 विधानसभा सीटों के उपचुनाव में पार्टी इस नई योजना के साथ उतरेगी। सभी सीटों के लिए बाकायदा सामाजिक-जातीय सर्वेक्षण भी कराया जा रहा है। बूथवार संगठन एक विशेष रिपोर्ट भी तैयार करा रहा है।  इस संदर्भ पार्टी अब सोशल मीडिया पर भी अपने तेवर तल्ख करने जा रही है।

इस तरह क्या बीजेपी क्या बीएसपी और क्या कांग्रेस सभी पार्टियां अपनी सियासी एजेंडे में सबसे ऊपर दलित एजेंडा रख दिया है और जागते सोते दलित-दलित कर रहे है। देखना यह होगा कि आने वाले समय में प्रदेश की सियासत में इसका क्या असर दिखता है।

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