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मिल्कीपुर में सपा की नैया पार लगाएगी PDA !

By Shakti Prakash Shrivastva on January 13, 2025
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर जिस तरह दिल्ली में सियासी हलचल चरम पर है उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी इन दिनों अयोध्या जिले के मिल्कीपुर विधानसभा सीट के लिए हो रहा उपचुनाव भी सुर्खियों में है। अयोध्या से जुड़ी सीट होने की वजह से जहां इस सीट का महत्व बीजेपी के लिए अहम है वहीं समाजवादी पार्टी के लिए यह सीट अहम इसलिए है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में यह सीट सपा के कब्जे में थी। इस बार उसे अपने कब्जे में बनाए रखने का सपा हर संभव प्रयास कर रही है। इस चुनाव में भी सपा अपना पीडीए का ट्रम्प कार्ड खेलेगी जिससे उसे मनमुताबिक परिणाम हासिल करने में कोई दिक्कत न आए।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के साथ ही यानि 5 फरवरी को उत्तर प्रदेश की मिल्कीपुर विधानसभा सीट के लिए भी उपचुनाव होना है। बीते 2022 के विधानसभा चुनाव में अयोध्या जिले की इस सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में अवधेश प्रसाद ने जीत दर्ज की थी। लेकिन बीते 2024 के लोकसभा चुनाव में अवधेश प्रसाद अयोध्या लोकसभा सीट से सांसद चुन लिए गए। लिहाजा इस सीट पर उपचुनाव हो रहा है। यहाँ अवधेश प्रसाद की जीत के पीछे बहुत बड़ा कारण इस क्षेत्र का जातीय समीकरण था। यहाँ पासी 60 हजार, यादव 65 हजार और 35 हजार मुस्लिम मतदाताओं के अलावा 50 हजार गैर पासी-दलित, 50 हजार ब्राह्मण और 25 हजार ठाकुर आबादी है। इसके नाते ही पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वाले एजेंडे पर सियासत करने वाली पार्टी सपा के लिए यह सीट मुफीद है। इस सीट का यह जातीय समीकरण ही प्रत्याशियों की जीत-हार का आधार बनता है। इस सीट पर कांग्रेस ने आइएनडीआईए गठबंधन धर्म का पालन करते हुए सपा के समर्थन में अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है। जबकि उपचुनावों में चुनाव न लड़ने के अपने ऐलान पर कायम रहते हुए बीएसपी ने भी अपना उम्मीदवार नहीं दिया है। इस तरह अब मुख्य लड़ाई सपा और बीजेपी के बीच ही होना है। सपा ने अपने प्रत्याशी के रूप में पूर्व प्रत्याशी अवधेश प्रसाद के बेटे अजीत प्रसाद को उतारा है जबकि बीजेपी अभी अपने उम्मीदवार के चयन को लेकर कवायद कर रही है। सत्ताधारी दल होने के नाते यूं तो बहुतेरे नाम है जिन्होने अपनी दावेदारी की है। लेकिन इनमें पार्टी के पूर्व विधायक गोरखनाथ के अलावा सुरेन्द्र रावत जैसे नौकरशाह का नाम प्रमुख है। क्योंकि बीजेपी इस सीट को लेकर इतनी संवेदनशील है कि वो यहाँ कोई रिस्क लेना नहीं चाहती है। यही वजह है कि जिताऊ उम्मीदवार की खोज में जुटी बीजेपी अभी अपना उम्मीदवार फाइनल नहीं कर पायी है।

बीजेपी की तैयारियों को देखते हुए सपा ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है। करो या मरो के सिद्धान्त पर इलाकाई मुद्दों को आगे करते हुए संविधान, आरक्षण और मंहगाई जैसे मुद्दों को सपा जिंदा बनाए रखना चाहती है। चुनाव परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन इलाके की जमीनी सच्चाई ये है कि यहाँ पीडीए समीकरणों की वजह से सपा का पलड़ा भारी है।

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