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July 14, 2026
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बीजेपी से फिर नाराज बृजभूषण !

By Shakti Prakash Shrivastva on July 14, 2026
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश की सियासत में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. सियासत में आत्म सम्मान के जिद्दी बृजभूषण अपने तरह के अनूठे नेता है. चाहे उत्तर प्रदेश में बुलडोजर की कार्रवाई की बात हो या या मुंबई नवनिर्माण सेना नेता राज ठाकरे के अयोध्या आने के मसले पर उनके विरोध का हो, बृज भूषण का मन जो करता है वही करते हैं. और यही आज तक करते रहे हैं. छः बार लोकसभा सांसद रह चुके बृज भूषण तनिक भी किसी का दबाव बर्दाश्त नहीं करते है. हाल ही में उनके एक बयान ने सियासी गलियारे में धूम मचा दी है. बयान के रूप में उन्होंने एक शेर कहा था कि यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता, कुछ तो रुस्वाइयाँ रही होंगी. सियासी जानकार जो सियासी बिम्ब को समझते हैं वो बखूबी समझते हैं कि बृजभूषण के इस शेर के अर्थ क्या हैं. यह एक सामान्य व्यक्ति भी समझता है कि यह केवल एक शेर भर नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई तरह के सियासी संकेत छोड़ने वाला वाक्य हो गया है। राजनीति में अक्सर नेता सीधे शब्दों में अपनी बात नहीं कहते, बल्कि प्रतीकों, इशारों और शेर-ओ-शायरी के माध्यम से अपने मन की पीड़ा या संदेश व्यक्त करते हैं। बृजभूषण सिंह का यह बयान भी उसी श्रेणी का माना जा रहा है।
बृजभूषण शरण सिंह लंबे समय तक भाजपा के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे हैं। कैसरगंज संसदीय क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ रही है और पूर्वांचल की राजनीति में उनका अलग प्रभाव माना जाता है। राम मंदिर आन्दोलन के प्रमुख सूत्रधारों में एक रहे बृजभूषण उस समय से आहत हैं जब मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया. यही वजह है कि बृजभूषण अयोध्या तो जाते हैं लेकिन राममंदिर नहीं जाते. उनका मानना है कि जहां अपमान हो वहाँ नहीं जाना चाहिए. जहां तक भगवान् राम का प्रश्न है तो वो हर जगह हैं.
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में उनके राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। महिला पहलवानों के आरोपों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर उनका नाम लगातार चर्चा में रहा। इसके बावजूद उन्होंने संगठन के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कोई बड़ा विद्रोह नहीं किया और पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी।
ऐसे समय में जब उन्होंने यह शेर पढ़ा, राजनीतिक हलकों में इसके कई अर्थ निकाले जाने लगे। एक वर्ग का मानना है कि यह उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक पीड़ा का इजहार है। संभव है कि उन्हें लगता हो कि जिन परिस्थितियों में उन्होंने पार्टी और संगठन का साथ दिया, उसी अनुपात में उन्हें राजनीतिक समर्थन नहीं मिला। ऐसे में “बेवफाई” और “रुस्वाइयाँ” जैसे शब्द उनके मन की कसक को व्यक्त करते दिखाई देते हैं।
फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि बृजभूषण सिंह का हर बयान मीडिया और राजनीतिक गलियारों में गंभीरता से लिया जाता है। इसकी वजह उनका जनाधार और उनका स्पष्टवादी स्वभाव है। यदि वे किसी मंच से भावनात्मक टिप्पणी करते हैं तो स्वाभाविक रूप से उसके राजनीतिक अर्थ तलाशे जाते हैं।
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ धीरे-धीरे शुरू हो रही हैं। भाजपा अपने संगठन को मजबूत करने में जुटी है, वहीं विपक्ष भी नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की मनःस्थिति भी चर्चा का विषय बन जाती है। यदि किसी नेता को उपेक्षा का अनुभव होता है तो उसका असर स्थानीय संगठन और समर्थकों पर भी पड़ सकता है। हालांकि अभी तक बृजभूषण शरण सिंह ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है जिससे यह कहा जा सके कि वे पार्टी से दूरी बना रहे हैं।
राजनीति में रिश्ते केवल पदों से नहीं चलते, बल्कि सम्मान, संवाद और विश्वास से भी चलते हैं। जब कोई अनुभवी नेता शायरी के माध्यम से अपनी भावना व्यक्त करता है तो उसे केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति मानकर नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होता। यह नेतृत्व के लिए एक संकेत हो सकता है कि संवाद बनाए रखना आवश्यक है। कहीं न कहीं बृज भूषण सिंह का शेर इतना तो संकेत देता ही है कि वो अपनी पार्टी से आहत हैं.
फिलहाल बृजभूषण शरण सिंह के इस बयान ने राजनीतिक चर्चाओं को जरूर नई दिशा दे दी है। आने वाले दिनों में यदि उनके बयान और राजनीतिक गतिविधियाँ इसी प्रकार के संकेत देती हैं, तब इस शेर के वास्तविक राजनीतिक मायने अधिक स्पष्ट हो सकेंगे। अभी इतना कहना उचित होगा कि यह टिप्पणी राजनीति में भावनाओं, सम्मान और रिश्तों की अहमियत को एक बार फिर रेखांकित करती है।

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