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सपा-काँग्रेस ही खिलाएंगे यूपी में BSP का कमल!

By Shakti Prakash Shrivastva on December 31, 2024
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           शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव
उत्तर प्रदेश में लगभग चार बार सरकार चला चुकी बीएसपी यानि बहुजन समाज पार्टी की हालत इन दिनों प्रदेश में बेहद नाजुक है। बीते लोकसभा चुनाव में बीएसपी का एक भी सांसद उत्तर प्रदेश में जीत हासिल नहीं कर सका था। ऐसे ही 2022 विधानसभा चुनाव में उसका मात्र एक विधायक ही जीत दर्ज करने में सफल हो सका था। हालिया सम्पन्न प्रदेश के नौ विधानसभा के लिए हुए उपचुनाव में भी बीएसपी का प्रदर्शन बहुत खराब था। सपा और कांग्रेस के गठजोड़ के बाद हुए लोकसभा में विपक्षी गठबंधन के दलों ने वो परिणाम हासिल किये जिसकी कल्पना न उन्हे थी और न ही सत्ताधारी गठबंधन को ही थी। इनके गठबंधन की ही देन थी कि सरकार की हेट्रिक पूरा करने वाली बीजेपी को पूर्ण बहुमत के आँकड़े से बहुत दूर रह जाना पड़ा। किसी तरह दलों की बैसाखी के सहारे बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब हो सकी। खासकर ऐसा उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम के नाते ही संभव हो सका। जो कांग्रेस और सपा के गठजोड़ से बने सियासी समीकरणों का परिणाम था। लेकिन अब इन्ही दोनों दलों में आपसी सहमति का अभाव हो गया है और इनका गठबंधन टूटने की कगार पर है। अगर विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में इनका गठबंधन टूटता है तो इसका लाभ बीएसपी को मिल सकता है।
क्योंकि लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर बड़ी संखया में दलित और मुस्लिम मतदाताओं का रुझान कांग्रेस-सपा की तरफ हुआ था। अब जबकि ये दोनों दल अलग हो जाएंगे तो इन मतदाताओं को नया ठौर तलाशना होगा। ऐसे में उत्तर प्रदेश में नए सियासी समीकरण बनने की संभावना बढ़ जाएगी। चुनाव दर चुनाव सियासी अनुभव से परिपक्व हो चुकी बीएसपी सुप्रीमो मायावती को इस बात का बखूबी एहसास हो गया है कि बिना अन्य दलों की मदद के उत्तर प्रदेश की सियासत में वापसी करना उनके लिए आसान नहीं होगा। लिहाजा सपा-कांग्रेस के बीच पनपी दूरी के बाद उपजे हालात में नए गठबंधन में शामिल होने का कोई अवसर मायावती नहीं गँवायेंगी। क्योंकि 2007 विधानसभा चुनाव के अलावा जितनी भी बार बीएसपी ने प्रदेश में सरकार बनाई वो अन्य दलों के सहयोग से ही बनाई। जब-जब मायावती ने गठबंधन के साथ रह चुनाव लड़ा है वो सफल रही है। और अकेले रह लड़े गए चुनाव में अधिकतर उनका दाँव उल्टा पड़ा है। 2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी को सिर्फ बलिया की रसड़ा विधानसभा सीट पर जीत मिली थी। जहां उमाशंकर सिंह ने चुनाव जीता था। 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। प्रदेश में नौ विधानसभा सीटों के लिए हुए उप चुनाव में खाता खुलना तो दूर उसका सियासी जनाधार भी पहले से और कम हो गया। अतीत के इन परिणामों से बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने सीख लिया है। अब वो पुरानी गलतियाँ दुहराने की बजाय लगातार अपने वोटबैंक वाले मतदाताओं को सहेजने के प्रति सतर्क है। आरक्षण के वर्गीकरण का मुद्दा हो या फिर संभल की घटना मायावती ने खुलकर अपनी बात रखी है। इतना ही नहीं बीएसपी छोड़कर जाने वाले दलित-पिछड़े और मुस्लिम नेताओं की घर वापसी का फूल्प्रूफ प्लान भी मायावती ने बनाया है। इसलिए सपा-काँग्रेस का गठबंधन जैसे ही उत्तर प्रदेश में टूटेगा,अवसर की तलाश में घात लगाए बैठी मायावती सरीखी नेता उसे लपक लेगी। इसका फायदा भी उन्हे मिलेगा।

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