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बिहार में बीजेपी की सियासत का खेवनहार बनेगा ‘भूरा बाल’

By Shakti Prakash Shrivastva on March 27, 2024
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

         यहाँ भूरा बाल का जिक्र एकबारगी अचरज पैदा करता है कि सियासत के संदर्भ में भूरा बाल का क्या मतलब। लेकिन ऐसा नहीं है इसका भी मतलब है खासकर बिहार की सियासत के संदर्भ में। इसको समझने के लिए 1990 के दशक वाले बिहार में आपको चलना होगा। यह समय बिहार में पिछड़ी जातियों के उभार का दौर था।  इसी दौरान लालू प्रसाद यादव ने अगड़ी जातियों के विरुद्ध ‘भूरा बाल यानि भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला साफ करो’ का नारा दिया था।  इसने तत्कालीन बिहार में जातिगत घृणा की सियासत को पूरी हवा दी । इसका बिहारी जनमानस पर गहरा असर भी पड़ा था। बाद के दिनों में लालू प्रसाद यादव की इसी सियासत को जेडीयू और बीजेपी जैसे अन्य दलों ने अपने लिए कैश किया और आरजेडी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार ने 2005 से बिहार में विकास की नयी सियासत को परवान चढ़ाया और बिहारी राजनीति की परिभाषा को बदलने का प्रयास किया। आज विपक्षी दल बीजेपी पर सवर्णों और बनियों की पार्टी होने का आरोप लगाते है।  जबकि यह कड़वी सच्चाई है कि बिहार मे पार्टी ने जिस तरह अपने कोटे के 17 लोकसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं। उससे यह साबित होता है कि यह  पार्टी वैसी ही पार्टी है जैसी विपक्षियों का  आरोप है और वह इस बार लोकसभा चुनाव में अपनी नैया भूरा बाल के सहारे ही पार करने के मूड में है।

बिहार में एनडीए गठबंधन के घटक दलों बीजेपी और जेडीयू में सीटों को लेकर जो समझौता हुआ है उसमें बीजेपी को 17 और जेडीयू को 16 सीटे मिली हैं। इसके तहत बीजेपी ने अपने सभी 17 प्रत्याशियों के नामों की घोषणा कर दी है। इनमें 11 सवर्ण प्रत्याशी हैं। नवादा से विवेक ठाकुर, औरंगाबाद से सुशील कुमार सिंह, बक्सर से मिथिलेश तिवारी, आरा से आरके सिंह, पटना साहिब से रविशंकर प्रसाद, बेगूसराय से गिरिराज सिंह, सारण से राजीव प्रताप रूडी, महाराजगंज से जनार्दन सिग्रीवाल, दरभंगा से गोपालजी ठाकुर, अररिया से प्रदीप कुमार सिंह और पूर्वी चंपारण से राधा मोहन सिंह बीजेपी  के उम्मीदवार हैं, जो सवर्ण समाज से आते हैं।ऐसा कर बीजेपी ने स्पष्ट कर दिया है कि जाति उसके लिए महत्वपूर्ण नहीं है। बिहार के किसी भी दल ने सवर्णों को उतनी तरजीह नहीं दी है जितनी बीजेपी ने इस बार दी है।
इस तरह हुए टिकट वितरण के मामले में बीजेपी का मानना है कि जातीय समीकरण साधने की बजाय उम्मीदवारों की क्षमता और योग्यता को तवज्जो दिया जाए। उसने जिन दो सीटों पर अपने उम्मीदवार बदले भी हैं तो नए कैंडिडेट भी उसी जाति से बनाए हैं। बक्सर से अश्विनी चौबे का टिकट पार्टी ने काट दिया है। उनकी जगह गोपालगंज के मिथिलेश तिवारी को मौका दिया गया है। यानी ब्राह्मण का टिकट कटा तो ब्राह्मण ही नया प्रत्याशी बना है। ठीक उसी तरह मुजफ्फरपुर में पार्टी ने अजय निषाद को इस बार मौका नहीं दिया गया है तो उनकी ही जाति के राजभूषण निषाद को उम्मीदवार भी बना दिया है। सासाराम से छेदी पासवान को चलता किया है तो शिवेश राम को उम्मीदवार बनाया है। हालांकि सासाराम सुरक्षित क्षेत्र है तो वहां से किसी अनुसूचित जाति के नेता को ही उम्मीदवार बनाना मजबूरी थी।

बीजेपी की घोषित उम्मीदवारों की सूची में 11 सवर्ण उम्मीदवार हैं। हालांकि वैश्य समाज से सिर्फ संजय जायसवाल सूची में हैं। जातीय आधार पर देखें तो सवर्णों में राजपूत बिरादरी के सबसे अधिक छह उम्मीदवार हैं। दूसरे नंबर पर यादव समाज के उम्मीदवार हैं। पार्टी ने बिहार में अगर यादवों को दूसरे नंबर पर रखा है तो इसकी वजह मध्य प्रदेश का उसका प्रयोग है। डा. मोहन यादव को मध्य प्रदेश का सीएम बना कर पार्टी ने यादव कार्ड खेला था। बिहार में नित्यानंद राय, रामकृपाल यादव और अशोक यादव को फिर से मौका मिला है। तीसरे नंबर पर भूमिहार और ब्राह्मण हैं, जिन्हें दो-दो सीटें दी गई है। रविशंकर प्रसाद अकेले कायस्थ बिरादरी का प्रतिनिधित्व करते सूची में दिख रहे हैं। बीजेपी ने इस बार बिहार में किसी महिला को लोकसभा चुनाव लड़ने का मौका नहीं दिया है। इतना ही नहीं इस बार पार्टी ने किसी मुस्लिम को भी उम्मीदवार नहीं बनाया है।

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