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यूपी में डैमेज होगा अखिलेश यादव का PDA या मैनेज होगा !

By Shakti Prakash Shrivastva on July 13, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

           लोकसभा चुनाव होने में अभी समय है लेकिन देशभर में बीजेपी को हराने के लिए विपक्षी दल आपसी बैर भुला एक ठौर तलाशने में लग गए हैं। इसके लिए पिछले 23 जून को पटना में ऐसे दलों की एक बैठक हुई। बैठक में कुल पंद्रह विपक्षी दलों के दिग्गज नेताओं ने हिस्सा लिया था। लेकिन इससे इतर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव यूपी के संदर्भ में एक अलग बिसात बिछा रहे हैं। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं को एक छत के नीचे लाकर PDA नाम से बीजेपी को शिकस्त देना चाहते हैं अखिलेश यादव। लेकिन प्रदेश में उनके अलावा बीएसपी सुप्रीमो मायावती, रालोद प्रमुख जयंत चौधरी, सुभासपा सुप्रीमो ओम प्रकाश राजभर सहित कांग्रेस के नेताओं की सियासत इनके मुहिम को पलीता लगाने सरीखा लग रहा है। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि यूपी में अखिलेश यादव की PDA सरीखा मुहिम डैमेज होगा या फिर इन दलों के साथ मैनेज होगा। PDA शब्द का सियासी प्रयोग सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने पटना में आयोजित विपक्षी दलों की बैठक के बाद पहली बार किया था। उन्होंने कहा था कि सब लोग दिल बड़ा करके आगे बढेंगे। इस बार जनता एक है, एनडीए को PDA हराएगा। पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक मिलकर इस बार भारतीय जनता पार्टी का सफाया करेंगे। पिछले दिनों अखिलेश यादव ने यह भी कहा था कि आने वाले लोकसभा चुनाव में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) की एकता राजग-बीजेपी पर भारी पड़ेगी।

अखिलेश यादव ने यूपी के सभी 80 लोकसभा सीटों पर बीजेपी को शिकस्त देने के लिए नारा देते हुए कहा था कि हमारा नारा है 80 हराओ-बीजेपी हटाओ। इसलिए 2024 में PDA यानि पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यकों की एकता राजग गठबंधन पर भारी पड़ेगी। उत्तर प्रदेश कि सियासत में अब खासा प्रभाव रख रहे अखिलेश यादव यदि इतना दावा कर रहे है तो दावे की हकीकत को भी समझना होगा। PDA मतलब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। इसके जमीनी प्रभाव का आकलन करने के लिए इसके आंकड़ों पर ध्यान देना होगा। सूत्रों की माने तो यूपी में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की आबादी करीब 41 फीसदी है। जिसमें करीब 10 फीसदी यादव हैं। दलित आबादी करीब 21 फीसदी और अल्पसंख्यक आबादी भी करीब 20 फीसदी के लगभग है। इस तरह यूपी में कुल लगभग 82 फीसदी आबादी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों की है। इन तीनों का प्रदेश में कम्यूनिटी वोट शेयर 82% के लगभग आता है। यहाँ के संदर्भ में ऐसा माना जाता है कि अल्पसंख्यक वोट बैंक कमोबेश सपा के साथ है। जबकि दलित अभी भी बीएसपी के साथ और पिछड़ा वोट बैंक बीजेपी, सुभासपा, अपना दल और सपा में बंटा हुआ है।

पार्टी के हिसाब से पर्फार्मेंस देखें तो यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी का वोट शेयर 22% था। जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव आते-आते उसका वोट शेयर घटकर 11% रह गया। इस तरह उसे 11% वोट शेयर का नुकसान हुआ। सियासी जानकारों का मानना है कि यह वोट बैंक बीजेपी में शिफ्ट हुआ है। PDA के जरिए अखिलेश इसी वोट बैंक में सेंधमारी करना चाहते हैं। इस तरह यदि अखिलेश की योजना की मुताबिक  दलित और यादव के साथ पिछड़ा वर्ग का वोट अखिलेश को मिल गया तो सपा की जीत बड़ी हो सकती है। बीजेपी भी इसके लिए जोड़-तोड़ में लगी हुई है। सियासत के जानकारों की मुताबिक 2014 लोकसभा चुनाव में बीएसपी खाता नहीं खुला था जबकि कांग्रेस को महज 2 सीटों से संतोष करना पड़ा था। 2017 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी के 19 विधायक जीते थे। इस तरह पिछले दो चुनावों में बीएसपी की दलित और पिछड़ों के बीच पैठ कम होती दिखी। ऐसे अखिलेश यह बखूबी समझ चुके हैं कि सिर्फ मुस्लिम-यादव गठजोड़ से सत्ता का सिंहासन नहीं मिलेगा। इसी जुगत में अखिलेश विपक्षी गठबंधन पर फोकस कर रहे है। वो चाहते है कि अपनी चाहत को गठबंधन के जरिए हासिल कर लें। 2022 की विधानसभा चुनाव में सपा ने 111 सीट हासिल की। जबकि उनका वोट प्रतिशत 21.82 था। अब अखिलेश इस वोट शेयर को गठबंधन की मदद से बढ़ाना चाहते हैं। चूंकि सुभासपा सुप्रीमो ओपी राजभर भी अखिलेश से अलग हो चुके हैं। लिहाजा ऐसी स्थिति में डैमेज कंट्रोल उन्हें ही करना पड़ेगा। ऐसा होने पर वो सत्ता के केंद्र तक पहुंच सकते हैं। दूसरी तरफ इससे बीजेपी को नुकसान हो सकता है। उत्तर प्रदेश में जातीय आंकड़ों के लिहाज से दलितों में जाटवों की संख्या ज्यादा है। दूसरे नंबर पर लगभग 8.77% आबादी वाले यादव आते है। तीसरे नंबर पर 8.62%ब्राह्मण, चौथे पर 4.29% राजपूत, पांचवें पर 3.36%पासी-एससी और छठे पर 3.02% वाले कुर्मी है। ऐसे में सपा सुप्रीमो ने चाल तो सही चली है लेकिन देखना होगा कि इस चाल का दूरगामी चुनाव परिणाम क्या होता है।

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