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October 8, 2026
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सुलझ नहीँ रही गवर्नर और सीएम की गुत्थी !

By Shakti Prakash Shrivastva on August 18, 2025
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                                                                            शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

किसी राज्य में सत्ता अगर केंद्र में सत्तारूढ़ दल से अलग दल की होती है तो वहाँ गवर्नर यानि राज्यपाल और वहाँ की सरकार या सीएम यानि मुख्यमंत्री के बीच टकराहट होने की संभावना रहती है। हालांकि राज्यपाल का पद नितांत संवैधानिक होता है लेकिन व्यवहारतन ऐसा देखा गया है कि वो केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर ही कार्य करता है। ऐसे में सियासी हितों के चलते दोनों के बीच मतभेद होना लाजिमी है। पश्चिम बंगाल, पंजाब, दिल्ली जैसे कई प्रदेशों में ऐसा देखा गया है। हालिया उदाहरण हिमाचल प्रदेश का है। यहाँ पिछले कुछ समय से राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ल और मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू में मनभेद की तलवारें खींची हुई है। ताजा मामला हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय और बागवानी विश्वविद्यालय में कुलपति की नियुक्तियों को लेकर सामने आया है। इसके पहले पिछले साल से लेकर अब तक कई विधेयक राजभवन में लंबित हैं और इस मुद्दे पर दोनों के बयान भी मीडिया मे आते रहते है। लेकिन दोनों के बीच रिश्ते में तल्खी बरकरार है और सुलझते दिख भी नहीं रही है।

राजभवन में साल 2023 से लेकर बीते बजट सत्र तक लंबित कई विधेयकों को लेकर राज्य सरकार पहले से ही नाराज है।  पिछले दिनों प्रदेश में नशे को रोकने के लिए रिहेबिलिटेशन सेंटर निर्माण को लेकर राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ल का एक बयान आया था जिस बयान पर मुख्यमंत्री सुक्खू ने कड़ी आपत्ति जताई थी और कहा था कि राज्यपाल को अपने पद की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए। अभी वो विवाद सुलझा भी नहीं था कि  विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से लेकर अब तक कई विधेयक राजभवन या राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजे हैं लेकिन अधिकांश आज तक लंबित है।  लगभग डेढ़ दर्जन विधेयक ऐसे हैं जो निस्तारण की राह जोह रहे है।

पिछले सप्ताह प्रदेश सरकार ने डॉ. वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, सोलन और सीएसके हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर में कुलपति चयन के लिए 21 जुलाई को जारी विज्ञापनों को ‘शून्य और अमान्य’ घोषित कर वापस ले लिया था। सरकार के इस निर्णय के बाद राज्यपाल ने बतौर कुलाधिपति प्राप्त वैधानिक अधिकारों का उपयोग करते हुए इन विज्ञापनों को फिर से बहाल कर दिया और कुलपति पदों के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 18 अगस्त शाम 5 बजे तक बढ़ा दी। इसके बाद से दोनों के बीच चली या रही अविश्वास की खाई और बढ़ गई। मामला फिलहाल हाईकोर्ट में लंबित है। कुछ प्रोफेसरों की याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने राजभवन की ओर से बढ़ाई गई तिथि पर स्टे लगा दिया है। राज्यपाल के इस निर्णय से आहत मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि विश्वविद्यालयों के मामलों में चांसलर की शक्ति संवैधानिक नहीं है बल्कि राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त है।  इसलिए राज्य सरकार के निर्णयों पर अमल होना चाहिए। मेरा मानना है कि अधिकारियों ने राज्यपाल के सामने तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्यपाल केवल संवैधानिक प्रमुख हैं और उन्हें राज्य सरकार की सलाह पर ही काम करना होता है।

अब देखना ये है कि राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच उलझी यह गुत्थी कब तक सुलझती है।

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