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यूपी में सियासी खरमंडल !

By Shakti Prakash Shrivastva on September 21, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

                       देश की लोकसभा में आखिरकार बहुप्रतीक्षित महिला आरक्षण बिल यानि नारी शक्ति वंदन अधिनियम पेश हो गया है। इस बिल के पास होने से सबसे अधिक सियासी खरमंडल अगर किसी प्रदेश में देखने को मिलेगा तो वो होगा उत्तर प्रदेश। क्योंकि देश को सबसे अधिक सांसद देने वाला सूबा होने के बावजूद इस सूबे की सियासी पार्टियों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी महज नाम मात्र का है। इनमे क्या बीजेपी, कांग्रेस, सपा, बीएसपी और क्या अन्य पार्टियां। सभी की स्थिति कमोबेश एक जैसे ही है। बीते लगभग तीन दशकों में कई बार प्रयास विफल रहने के बाद आखिरकार लोकसभा में एक बार फिर बिल पेश करने वाली पार्टी बीजेपी में भी महिलाओं की भागीदारी नगण्य ही हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यूपी बीजेपी इकाई में अभी तक बने 14 प्रदेश अध्यक्षों में एक भी महिला नाम नहीं है। इतना ही नहीं 75 जिलाध्यक्षों में महज 4 जिलाध्यक्ष महिला हैं। सरकार में भी योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में कुल 52 मंत्री है जिनमे मात्र 5 महिला मंत्री है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में भी यूपी से स्मृति ईरानी के रूप में एकमात्र महिला मंत्री हैं।

मौजूदा आंकड़ों की मुताबिक यूपी से संसद और विधानसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी 15 फीसद से भी कम है। सूबे की प्रमुख विपक्षी दल सपा में महिला नेता के नाम पर एकमात्र नाम पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव का ही जेहन में आता है। इसी तरह बीएसपी और कांग्रेस में भी शीर्ष नेताओं को छोड़ दें तो दूसरी लाइन में कोई महिला नेता नजर नहीं आती है। ऐसी परिस्थितियों में बिल पास हो जाने पर यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 26 सीटें और विधानसभा की 403 सीटों में 132 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी। इस औसत से अभी विधानसभा में 48 महिला विधायक है जो कुल विधायकों की संख्या के सापेक्ष बहुत कम है। जबकि विधान परिषद में भागीदारी लगभग 6 फीसद है। यूपी से लोकसभा में कुल 11 महिला सांसद हैं। इस तरह यूपी में विधानसभा और लोकसभा दोनों में ही महिलाओं की संख्या 15 फीसदी से भी कम है। इस परिस्थिति में इस बिल से यूपी की महिलायें सर्वाधिक लाभान्वित होंगी। लेकिन इससे अभी तक चली आ रही सियासी तस्वीर में जो बदलाव आएगा उसे सहजता से स्वीकारना भी बहुत आसान नहीं होगा। इससे राजनीतिक दलों में सियासी स्वीकार्यता का संकट शुरू में आयेगा। सूबे की सियासत में प्रभावी दखल रखने वाले बहुतेरे ऐसे नेता हैं जिनकी सियासत इस आरक्षण बिल से प्रभावित होगी। ऐसे में एकबारगी उनका परेशान होना लाजिमी होगा। इस महिला आरक्षण बिल को लेकर यूपी में अभी से गहमा-गहमी बढ़ गई है। फिलहाल ये गहमा-गहमी राजनीतिक दलों के स्तर पर सर्वाधिक दिख रही है। प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी सपा ने पिछड़ा,दलित और अल्पसंख्यकों की चिंता जताते हुए आरक्षण बिल का समर्थन किया है। जबकि बीएसपी ने समर्थन करते हुए इसमें सीधे पचास फीसद आरक्षण की मांग कर दी है।

 

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