Responsive Menu
Add more content here...
August 10, 2026
ब्रेकिंग न्यूज

Sign in

Sign up

सपा गठबंधन : हर चुनाव बाद दूर हो जाते हैं ‘सगे’

By Shakti Prakash Shrivastva on July 23, 2022
0 556 Views

शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव एक ऐसे राजनेता है जिनका औरों से अलग राजनीतिक इकबाल रहा है। चाहे सत्ताधारी दल हो या विपक्षी, सभी के नेता मुलायम सिंह के यारों के यार वाली छवि के कायल रहे हैं। शायद यही वजह है कि राज्य के सियासत में सभी दलों के लिए वो आज भी ‘नेताजी’ हैं। उनकी हर दल में बतौर राजनेता अलग स्वीकार्यता है। लेकिन उन्ही के विरासत के उत्तराधिकारी अखिलेश यादव में उनके ये गुण दूर-दूर तक नहीं दिखते। समय से पहले बतौर मुख्यमंत्री का सत्ता सुख उनके इस कमी को कालांतर में और गहरा करता गया। अतीत पर गौर करे तो इसके स्पष्ट प्रमाण हैं। जब पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाले तो स्थिति ये हो गई कि पहले राजनीतिक इम्तिहान यानि लोकसभा चुनाव में ही बहुत अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके। उसके बाद 2017 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कुछ ऐसा हुआ कि देखते-देखते पूरा यादव कुनबा ही बिखर गया। समाजवादी पार्टी के गठन में अहम भूमिका रखने वाले शिवपाल यादव को न केवल प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया गया बल्कि उन्हे अंततः पार्टी छोड़ने को मजबूर कर दिया गया। शिवपाल ने अलग प्रगतिशील समाजवादी पार्टी बना ली। अखिलेश यादव मुलायम सिंह यादव को अपदस्थ कर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। अपनी अध्यक्षता में होने वाले पहले विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने पहला अहम राजनीतिक निर्णय लेते हुए बड़े जोशो-खरोश और उत्साह से ऐतिहासिक गठबंधन कांग्रेस के साथ किया। राहुल-अखिलेश का अनूठा चुनाव प्रचार भी हुआ। लेकिन परिणाम अपेक्षा के अनुकूल नही रहा। प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी की बहुमत वाली सरकार बन गई। एक साल के अंदर ही स्थिति ऐसी बनी कि अखिलेश-राहुल यानि सपा-कांग्रेस के रास्ते जुदा हो गए। अखिलेश की अगुवाई में समाजवादी पार्टी का दूसरा अहम चुनाव लोकसभा 2019 था। इसमें अखिलेश ने अभिनव प्रयोग करते हुए अपने पार्टी के परंपरागत प्रतिद्वंदी मायावती की बहुजन समाज पार्टी से 34 साल बाद गठबंधन किया। एक बार फिर बीजेपी के नरेंद्र मोदी के तिलिस्म के आगे समाजवादी पार्टी को 2014 की तरह महज पाँच सीटों से ही संतोष करना पड़ा जबकि बहुजन समाज पार्टी को 2014 की तुलना में 10 सीटों का फायदा हुआ। 2014 में उसे एक भी सीट नही मिली थी। चुनाव परिणाम के बाद महज छः माह की कुल अल्प गठबंधनी उम्र में ही इतिहास रचाउ गठबंधन बिखर गया। सपा और बसपा के रास्ते फिर पहले की तरह अलग-अलग हो गए। समय बीता अखिलेश के सरपरस्ती वाले समाजवादी पार्टी के सामने तीसरा चुनाव विधानसभा का 2022 आया। इसमें अखिलेश ने अपने राजनीतिक नहीं बल्कि कूटनीतिक चाल के चलते बीजेपी के स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान, ओम प्रकाश राजभर सरीखे नेताओ सहित कुछ क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाले राष्ट्रीय लोकदल, महान दल, अपनादल कमेरावादी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसे दलों का महागठबंधन बना बीजेपी को सत्ता से अपदस्त करने की चाल चली। परिणाम ये रहा कि समाजवादी पार्टी की विधायकों की संख्या में तो लगभग दूने का इजाफा हुआ लेकिन सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुँच सके। नतीजतन पूर्व की भांति एक बार फिर अखिलेश अपने गठबंधन के साथियों को सहेजने में नाकाम साबित हुए। पहले महान दल फिर शिवपाल यादव और सुभासपा सुप्रीमो ओमप्रकाश राजभर पार्टी के लिए तलाकशुदा हो गए। नेतृत्व की भूमिका में आने के बाद से लगातार ऐसा दिख रहा है कि अखिलेश अन्य दलों से अपने रिश्ते बहुत दिनों तक मधुर नहीं रख पा रहे हैं। राजनीतिक के जानकारों की मुताबिक होता ये है कि चुनाव के बाद अखिलेश, पार्टी को नए सिरे से तैयार करने की कोशिश करने लगते है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह चाहते है कि अगले चुनाव तक वह अकेले दम पर फिर से लड़ सके। इसलिए नतीजा आने के बाद ही वह गठबंधन की पार्टियों को नजरअंदाज करना शुरू कर देते है। खासतौर पर उन दलों को जिनके साथ रहने से उन्हें नुकसान पहुंचने का डर होता है। इस बार भी अखिलेश ने कुछ ऐसा ही किया। सपा ने रालोद के साथ अच्छे रिश्ते बरकरार रखे क्योंकि अखिलेश जानते हैं कि पश्चिम यूपी में बगैर रालोद के वह कुछ नहीं कर सकते हैं। जबकि पूर्वांचल में राजभर के बगैर सपा अकेले दम पर मजबूत हो सकती है। इसीलिए राजभर और अन्य के साथ उनका व्यवहार बदल गया।

 

 

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *