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मिशन 2024 : सपा के सामने मुस्लिमों को साधे रहने की बड़ी चुनौती

By Shakti Prakash Shrivastva on October 20, 2022
0 562 Views

शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव की आवाज में  पूरी रिपोर्ट  सुनने के लिए क्लिक करें।

शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

लोकसभा चुनाव 2024 को देखते हुए उत्तर प्रदेश में सियासी गतिविधियां शुरू हो गयी हैं। राजनीतिक दलों के नेता भी अपने लिए सुरक्षित सियासी ठौर तलाशने शुरू कर दिये हैं। लेकिन सबसे ज्यादा खलबली मुस्लिम नेताओं और उनके वोट बैंक को लेकर समाजवादी पार्टी में दिख रही है। उसकी वजह साफ है। अभी तक मुस्लिमों के लिए समाजवादी पार्टी एक सुरक्षित ठौर था। जबकि मौजूदा दौर में स्थितियाँ बदली हैं। अब यह पहले की तरह सुरक्षित नहीं रह गया है। यही वजह है कि कल तक सपा से गलबहियाँ करने वाले मुस्लिम नेता अब नए ठौर तलाशने लगे हैं। वर्तमान की जमीनी सच्चाई ये है कि मुस्लिमों को अपने साथ लाने के लिए न केवल बीएसपी और कांग्रेस बल्कि बीजेपी भी लगी हुई है। इसके लिए बाकायदा राष्ट्रीय स्तर पर पसमानदा मुसलमानों के लिए बीजेपी ने एक बड़ा कार्यक्रम भी कराया था।

सपा से मुस्लिमों का मोहभंग हो रहा

बीएसपी, कांग्रेस और बीजेपी द्वारा मुस्लिम नेताओं पर डाले जा रहे डोरे से समाजवादी पार्टी के पेशानी पर बल पड़ने लगे हैं। क्योंकि अभी तक का ट्रेक रिकार्ड रहा है कि मुस्लिम पूरी तरह सपा के साथ रहा है। यदि वो उससे दूर हुआ तो सपा का कमजोर होना तय है। इसी स्थिति को देखते हुए अखिलेश यादव भी चिंतित हैं। सूबे के सियासी हल्कों में इस बात की चर्चा तेज है कि लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटों का झुकाव किसके साथ होगा। सूबे की 403 विधानसभा सीटों में से लगभग डेढ़ सौ से अधिक पर इनका न केवल प्रभाव है बल्कि पचास से अधिक पर तो निर्णायक स्थिति में हैं। कुल सियासी हिस्सेदारी लगभग 18 प्रतिशत है। 2022 के विधानसभा में 98 प्रतिशत के लगभग मुस्लिमों का समर्थन पाने के बावजूद सपा को सत्ता नही मिली। इसलिए अब स्थितियाँ बदल रही हैं।

बीएसपी, कांग्रेस के साथ बीजेपी भी डाल रही है डोरे

अब जहां बीएसपी, कांग्रेस और बीजेपी जैसी पार्टियां मुस्लिमो को सपा से दूर करनी की कवायद कर रही हैं वहीं सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि वो मुस्लिमों को कैसे अपने साथ लोकसभा चुनाव तक बनाए रखे। प्रदेश की विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या पर गौर करें तो 1989 में 38 मुस्लिम विधायक थे और भागीदारी लगभग 11 प्रतिशत से घटकर 8.9 प्रतिशत रह गयी थी। वर्ष 1991 में 4.1, 1993 में 5.9, 1996 में 7.8 और वर्ष 2002 में फिर 11.7 प्रतिशत भागीदारी पहुँच गयी थी। यही 2007 में 13.9, 2012 में 17.1 प्रतिशत हो गया। इस दौरान सदन में 67 मुस्लिम विधायक थे लेकिन 2017 में यह 5.9 प्रतिशत हो गया। 2022 में 34 विधायक सदन पहुंचे थे और प्रतिशतता करीब 8.4 प्रतिशत हो गयी।

मजबूती से साथ होने का अहसास दिलाना होगा अखिलेश को

जानकारों का मानना है कि मुस्लिमों के शिक्षित होने से अब उनकी प्राथमिकताये भी बदली हैं। अब उसे धर्म की बजाय विकास, शिक्षा और सेहत की चिंता है। इसलिए अब उनमें बिखराव होना निश्चित सा दिख रहा है। कुछ एक विशेषज्ञों का मानना है कि सपा को अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। उसे मुस्लिमों को विश्वास में लेते हुए यह एहसास दिलाना होगा कि वो उसके साथ थी और आगे भी मजबूती के साथ रहेगी। शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली, इमरान मसूद, इकराम कुरेशी,रिजवान जहीर, आरिफ़ अनवर, अजीम, इलियास अंसारी और अयोध्या के रश्दी मियां जैसे कई ऐसे मुस्लिम नेता हैं जिन्होने सपा से अपना नाता तोड़ लिया है। यही संकेत सपा की चिंता का कारण है। मुलायम सिंह यादव की अनुपस्थिति में इसी को साधना अखिलेश यादव की सबसे बड़ी परीक्षा है।

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