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यूपी में आजम के बहाने नए मोर्चे की कवायद!

By Shakti Prakash Shrivastva on April 29, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

          जेल में बंद समाजवादी पार्टी नेता मोहमद आजम खान को केंद्र में रखकर उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों जो बवंडर उठा हुआ है। राजनीति के जानकार इसे देश में बनने वाले एक नए सियासी गठजोड़ की तैयारी के रूप में देख रहे है। प्रदेश की  राजनीति में बीजेपी के बाद दूसरे सबसे बड़े दल समाजवाद पार्टी की बात करे तो इस समूचे घटनाक्रम मे सबसे ज्यादा उसी की  छिछालेदर होते हुए दिख रही है। सबसे पहले आजम खान के प्रवक्ता फ़साहत अली खान शानू ने पार्टी पर मुस्लिमों को छलने का आरोप लगाया। शानू ने बकायदे प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि  पार्टी चाहती तो आज़म खान की यह दुर्दशा नहीं होती। उसने पार्टी पर यह भी आरोप लगाया कि पार्टी ने हमेशा मुस्लिमों को  वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल किया। इसके बाद तो एक के बाद एक पूरे प्रदेश के कोने-कोने से पार्टी के मुस्लिम विरोधी होने के सुर मे सुर मिलती हुई आवाजें आने लगीं। पूर्व विधायक इरशाद ने तो इसी तरह का आरोप लगा कर पार्टी से इस्तीफा दे दिया। कहीं पार्टी मुखिया विरोधी प्रदर्शन होने लगे तो कहीं समर्थन में खून के खत लिखे जाने लगे। इसके बाद 2017 विधान सभा चुनाव के पहले से सपा सुप्रीमो और अपने  भतीजे अखिलेश यादव का मुखर विरोध करने वाले सपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव ने एक बार फिर विरोध शुरू कर दिया है। शिवपाल 2022 विधानसभा चुनाव के पहले सपा गठबंधन में शामिल हुए फिर सपा के सिंबल पर जसवंतनगर (इटावा) से चुनाव लड़े और विधायक बने है। विधायक बनने के बाद चाचा शिवपाल का भतीजे अखिलेश से पहला विरोध तब हुआ जब अखिलेश ने विधायक दल की बैठक में शिवपाल को बुलावा नही भेजा। पहले शिवपाल ने नेताजी यानि मुलायम सिंह से मिलकर अपना विरोध जताया फिर कुछ सम्मान जनक न होने पर वो पिछले दिनो पार्टी के कददावर मुस्लिम नेता आजम खान से मिलने रामपुर जेल गए और जेल से निकलने के बाद से ही शिवपाल न केवल पार्टी, अखिलेश बल्कि पहली बार नेता जी मुलायम सिंह यादव के खिलाफ भी खासा मुखर नजर आए। यहाँ तक कह दिया कि नेताजी की पीएम नरेंद्र मोदी भी इज्जत करते है वो यदि चाह लेते तो आजम आज जेल के सलाखों के पीछे न होते। ऐसा तब हुआ जब शिवपाल ने जेल के अंदर आजम खान से मुलाकात की और जेल में उनकी दुर्दशा देखी। शिवपाल के बाद पार्टी के नेता रविदास महरोत्रा जेल मे आजम से मिलने गए जहां आजम ने उनसे मिलने से मना कर दिया। इसे भी पार्टी से आजम की नाराजगी और शिवपाल की तरफ झुकाव के तौर पर माना जा रहा है। इधर आजम को मुस्लिम अस्मिता के प्रतीक के तौर पर सियासी गलियारो मे जो तवज़्जो मिल रही है और भीम पार्टी सुप्रीमो चंद्रशेखर रावण, बाबू सिंह कुशवाहा, ददू प्रसाद जैसे सपा सुप्रीमो से दूरी बना कर चलने वाले नेताओं ने जिस तरह अपना समर्थन दिया उससे लगता है कि निकट भविष्य में खासकर 2024 के लोकसभा चुनाव तक देश में एक नया सियासी मोर्चा अस्तित्व में आ सकता है। कुछ छोटे दल भी इसमे सहभागी हो सकते है। संभव है कि शिवपाल या आजम मे से ही कोई इसका संयोजक बने। इस मोर्चे का स्वरूप ऐसा होगा की वो बीजेपी, कांग्रेस, सपा और बसपा से इतर नया विकल्प प्रदेश की जनता को देगा। यूं तो कुछ रणनीतिकार का यह भी मानना है की यह सारी कवायद आजम परिवार से किसी को राज्यसभा या विधान परिषद मे भेजे जाने के लिए दबाव बनाने की है। लेकिन कुछ दिनो पहले भीम आर्मी सुप्रीमो चंद्रशेखर रावण और रालोद सुप्रीमो जयंत चौधरी एक साथ देखे गए थे और बाद मे जयंत और चंद्रशेखर अलग अलग आजम परिवार से मुलाक़ात भी किये। सियासत के जानकार इस पूरे घटनाक्रम को दलित-मुस्लिम और जाट गठजोड़ बनाने की तैयारी के तौर पर देख रहे है। अगर आजम खां अलग होते है और कभी ऐसी नौबत आती है कि जयंत चौधरी भी सपा गठबंधन से अलग होते है तो इनके सहयोग से यह समीकरण काफी मजबूत साबित होगा। यह मजबूती सपा के लिए ही खतरनाक होगी।

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