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माता के बहाने ‘प्रसाद’ पाने की जुगत में विपक्षी

By Shakti Prakash Shrivastva on July 31, 2024
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                                                                          शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

समाजवादी पार्टी पिछले कुछ वर्षों से सियासत में प्रयोग पर प्रयोग किए जा रही है। उत्तर प्रदेश में सपा की अंतिम सरकार के कार्यकाल यानि 2012 से 2017 के बीच किए गए उसके कुछ प्रयोग सफल भी हुए। ऐसे प्रयोगों में सर्वाधिक चर्चा करने योग्य हाल के दिनों में किया उसका प्रयोग पीडीए का रहा। पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। इसके चलते बीते लोकसभा चुनाव में सपा ने इतिहास रचते हुए प्रदर्शन किया। उत्तर प्रदेश में राममंदिर निर्माण केआध्यात्मिक बयार के बीच 80 में से 37 लोकसभा सीटों पर कब्जा जमाया। अभी इस नए पीडीए प्रयोग की चर्चा हो ही रही थी कि सपा ने सवर्ण बिरादरी के एक कद्दावर चेहरे माता प्रसाद पांडे के माथे उत्तर प्रदेश की विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष का मौर बांध कर एक नई बहस को जन्म दे दिया। इस प्रयोग की सियासी गलियारे में जितनी मुंह उतनी बातें होने लगी है। कोई इसे बीएसपी की सोशल इंजीयनरिंग वाले फार्मूले का दोहराव तो कोई बीजेपी द्वारा बृजेश पाठक को उपमुख्यमंत्री बना ब्राह्मण को सम्मानित करने वाली सियासत का जवाब मान रहा है। सबसे ज्यादा इस प्रयोग का प्रभाव सूबे के अन्य दलों के नेताओं में देखने को मिल रहा है। क्या बीजेपी क्या कांग्रेस और क्या बीएसपी ऐसा लग रहा है कि सभी के हाथों से तोते उड गए हैं। बीजेपी की तरफ से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के पेट में इस निर्णय से पीडीए को लेकर दर्द बढ़ गया है। वहीं पिछले कुछ वर्षों से लगभग नेपथ्य में रहने वाले बीएसपी महासचिव सतीश चंद्र मिश्र भी अचानक चोला उतार बाहर आ गए हैं। उनके भी सुर मुखर होने लगे हैं और ये सभी अपने-अपने तरीके से इसका सियासी फायदा लेने में जुट गए हैं।

स्वस्थ सियासत के लिए ऐसा जरूरी भी है। नए-नए प्रयोग होते रहने चाहिए। समाजवादी पार्टी के लगभग चार दशक के सियासी सफर में ऐसा पहली बार हुआ है कि विधानसभा में किसी सवर्ण ब्राह्मण चेहरे को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर पार्टी की नुमाइंदगी दी गई है। वह भी ऐसे समय में जब अखिलेश यादव का पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक कार्ड सफल साबित हुआ है। हालांकि जैसा अमूमन होता है कि पार्टी के भीतर और बाहर के फ्रंट पर कुछ समर्थन-विरोध जैसे स्वर उठते है सो यहाँ भी उठ रहे हैं। दूसरे दल के नेताओं में भी इसको लेकर बेचैनी है। पूरे देश में जातीय जनगणना व संविधान बचाओ जैसे मुद्दों के बीच में यह पीडीए, सियासत का केंद्र बना हुआ है। ऐसे में अखिलेश के इस ब्राह्मणी कार्ड के बाद माना जा रहा है कि सियासी दुनिया में खासकर देश के उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली जैसे हिन्दी भाषी क्षेत्र में ब्राह्मणों की गोलबंदी बढ़ेगी। हालांकि इस सियासी कसरत का अंजाम क्या होगा इसको लेकर अभी कोई चर्चा नहीं हो रही है।

अखिलेश यादव के इस ब्राह्मण कार्ड को लेकर सियासी जानकारों का यह भी मानना है कि यह निर्णय अखिलेश के सामाजिक दांव से अधिक पार्टी व सदन के भीतर संतुलन की कवायद अधिक है। क्योंकि पार्टी के भीतर सियासी माहौल में चाचा शिवपाल यादव जैसे वरिष्ठ नेताओं के रहते सैफई परिवार से बाहर किसी मुफीद चेहरे का चुनाव आसान नहीं था।

माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने पर सबसे पहला सवाल बीजेपी ने उठाया। बीजेपी की तरफ से इसे पार्टी में पिछड़ों की सियासत के अहम चेहरे व डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने पीडीए की उपेक्षा करार देते हुए उठाया। हालांकि केशव के ऐसा कहने के पीछे भी सियासी कारण है। लोकसभा चुनाव में पिछड़े वोटों के खिसकने व कुर्मी-मौर्य बहुल सीटों पर बीजेपी की हार के बाद उनके जैसे पार्टी के दूसरे पिछड़े नेताओं का राजनीतिक कद सवालों के घेरे में हैं। ऐसे में नुमाइंदगी के सवाल के जरिए केशव का अपने खिसके वोटों की भरपाई की संभावना के लिए ऐसा कहना सियासी मजबूरी है। जबकि वही बीजेपी के ब्राह्मण नेताओं के सुर अलग हैं।

मानिकपुर से बीजेपी के पूर्व विधायक आनंद शुक्ला ने माता प्रसाद को बधाई देते हुए लिखा कि 15% ब्राह्मणों वोटों की जरूरत सबको है। जबकि बीएसपी प्रमुख मायावती की प्रतिक्रिया के बाद पार्टी में वर्षों से अलग-थलग पड़े राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा भी मुखर हो गए हैं। उन्होंने सपा सरकार में अगड़ों-पिछड़ों की उपेक्षा का तोहमत मढ़ा हैं। जबकि उनकी पार्टी की सबसे बड़ी चिंता ये है कि उनका अपना दलित वोट खिसक ही रहा है और सपा के इस प्रयास से अगड़ों का भी बचा-खुचा बिखरने की संभावना बढ़ गई है।

भले ही माता के बहाने सपा के विरोधी दल एन-केन प्रकारेण सियासी प्रसाद पाने की कवायद कर रहे है। लेकिन हकीकत ये है कि सपा के इस कार्ड के सफल होने की संभावना अधिक है। क्योंकि बीते लोकसभा चुनाव में ब्राह्मण मतदाताओं के प्रभाव वाली उत्तर प्रदेश की धौरहरा, सीतापुर, बांदा, बलिया, बस्ती, इलाहाबाद, चंदौली, जौनपुर आदि सीटें सपा के खाते में गई हैं। समाजवादी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में इन क्षेत्रों में अपने विस्तार की संभावनाएं देख रही है। इस समय उत्तर प्रदेश की विधानसभा में बावन ब्राह्मण विधायक है।

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