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August 10, 2026
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शिष्टाचार बनेगा सियासत का आधार !

By Shakti Prakash Shrivastva on August 23, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

                           दक्षिण भारत की इलाकाई सियासत में खासा दखल रखने की वजह से नब्बे के दशक में जयललिता जैसी कद्दावर मुख्यमंत्री को सत्ता से बेदखल करने वाले लोकप्रिय फिल्मस्टार रजनीकान्त इन दिनों उत्तर प्रदेश के दौरे पर हैं। अयोध्या में रविवार को परिवार समेत रामलला के दर्शन करने से पूर्व रजनीकान्त ने लखनऊ में पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बाद में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से शिष्टाचार मुलाकात की। मुख्यमंत्री योगी से मुलाकात करते समय रजनीकान्त ने उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया जबकि अखिलेश यादव से मुलाकात के वक्त उनसे गले मिलकर उनका हालचाल जाना। ऐसे में जबकि प्रदेश-देश में सत्तारूढ़ बीजेपी और प्रमुख विपक्षी समाजवादी पार्टी दोनों ही दक्षिण भारत में अपना सियासी दायरा बढ़ाना चाहते हैं। रजनीकान्त का पैर छूने और गले मिलने जैसे शिष्टाचार आने वाले दिनों में इन दलों की सियासत का प्रमुख आधार साबित हो सकता है।

बेशक रजनीकान्त किसी पार्टी विशेष में प्रत्यक्ष तौर पर नहीं है लेकिन दक्षिण भारत के हर वर्ग विशेष में उनका किसी सियासी नामचीन सियासी नेता से ज्यादा प्रभाव है। ऐसे में रजनीकान्त का योगी आदित्यनाथ का पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेने वाली तस्वीरें बीजेपी की सियासत के लिए दक्षिण में सियासी संजीवनी देने वाली साबित हो सकती है। हालांकि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का गले मिलने वाली तस्वीर भी विपक्षी गठबंधन इंडिया को इलाके में सियासी ताकत दे सकती है। दक्षिण भारत खासकर तमिलनाडु में आज भी शिष्टाचार और धार्मिक संस्कार का खासा महत्व है। यही वजह है कि पाँव छूने वाली सियासत का यहाँ मजबूत आधार है। इसके चलते जयललिता से लेकर करुणानिधि तक का कई-कई बार यहाँ राजतिलक होता रहा है।

एक बार 31 दिसंबर 2017 को ऐसा हुआ कि रजनीकांत ने तमिलनाडु की सभी 237 सीटों पर अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी थी। इसके लिए उन्होंने “रजनी मक्कलम मंदरम” (आरएमएम) नाम से एक राजनीतिक पार्टी भी बनाई। 2021 में होने वाले विधानसभा के चुनावों में प्रतिभागिता की मजबूत तैयारियां भी शुरू कर दीं। लेकिन बदली परिस्थितियों में चुनाव से पहले ही उन्होंने न केवल पार्टी भंग कर दी बल्कि भविष्य में सियासत से दूर रहने का निर्णय भी ले लिया। वैसे सियासी जानकारों की माने तो सियासी गतिविधियों में रजनीकान्त के बीजेपी और डीएमके के नजदीक होने की सुर्खियां सियासी गलियारे में अक्सर होती रहती हैं। सियासत के जानकार मानते है सियासी गलियारे में हर घटना का कुछ न कुछ अपना महत्व होता है। ऐसे में अगर इतना प्रभावशाली शख्सियत किसी दूसरे कद्दावर शख्सियत का पैर छूता है या गले मिलता है तो उसका निहितार्थ ढूँढना लाजिमी है। हमारे भारतीय समाज में पैर छूना या गले मिलना शिष्टाचार की श्रेणी में आता है और अगर यह शिष्टाचार चुनावी माहौल में हो तो वो सीधे-सीधे मतदाताओं को प्रभावित करने का कारक बनता है। चूंकि रजनीकांत के दक्षिण भारत में करोड़ों-करोड़ प्रशंसक हैं लिहाजा उनके पांव छूने का बड़ा संदेश जाएगा ही जाएगा। वैसे भी दक्षिण भारत में पांव छूकर अपनी आस्था प्रकट करने की सियासी परम्परा सदियों से चलती चली आ रही है। दक्षिण में जयललिता के दौर में पांव छूने की परंपरा खूब रही। परंपरा अब भी है लेकिन जब जयललिता के सामने लोग जाते थे वे न सिर्फ उनके पांव छूते थे बल्कि उनके सामने लेटकर अपने हाथों को जयललिता के पांवों की ओर बढ़ाकर दंडवत हो जाते थे। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांव छूकर ही आशीर्वाद लिया था। इसी तरह तमाम तल्खियों के बाद जब सपा और बसपा का गठबंधन हुआ तो डिंपल यादव ने मायावती के पांव छूकर आशीर्वाद लिया था। यूं तो पांव छूना और गले लगना हमारे समाज की पुरानी परंपरा है जिसे सामाजिक शिष्टाचार की श्रेणी में रखा जाता है। लेकिन यही शिष्टाचार जब सियासत के दरमियान किये जाएँ तो इसके मायने भी निकाले जाते हैं और उसका एक संदेश भी होता है। बहरहाल, रजनीकांत ने बेशक मुख्यमंत्री योगी के पांव छूकर और अखिलेश यादव से गले मिलकर जो भी सियासी संदेश दिए हों, लेकिन इससे दोनों ही खेमों में अटकलों का बाजार गर्म है। बीजेपी में तो चर्चा है ही विपक्षी गठबंधन भी अखिलेश के साथ रजनीकांत के गले मिलने को बेहद संजीदगी और उम्मीदों के साथ ले रहा है। उसे लग रहा है कि रजनीकांत का नैतिक समर्थन ही उनके जनाधार को दक्षिण में मजबूत करेगा।

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