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योगी के लिए सियासत से अहम है ‘विकास’

By Shakti Prakash Shrivastva on April 19, 2022
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

          आज के नित नए बदलते राजनीतिक अवधारणाओं के बीच जहां जनता के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक ‘विकास’ भी राजनेताओं के लिए राजनीतिक हित के आगे कोई मायने नहीं रखते हैं। वही एक ऐसा राजनेता भी है जिनके लिए राजनीति तो मायने रखता ही है लेकिन उसकी भी सीमा निर्धारित है। विकास की राह में रोड़ा बनने वाली राजनीति उन्हे कभी रास नहीं आई। यही वजह है कि उन्हे उनके ही दल में कई बार असहज स्थितियों का सामना भी करना पड़ा। कई बार बगावत के सुर भी बोलने की नौबत आन पड़ी। जी हाँ मै बात कर रहा हूँ योगी आदित्यनाथ की। जो नाथ संप्रदाय के गोरखपुर स्थित सर्व प्रतिष्ठित गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर है और वर्तमान मे देश के सबसे बड़े सूबे यानि उत्तर प्रदेश के दूसरी बार मुख्यमंत्री है। एक समय था जब योगी पहली बार 2017 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उन्हे विकास संबंधी योजनाओं के हितार्थ नोएडा-गाजियाबाद दौरे पर जाना था। लोगों ने उन्हे जानकारी दी कि सूबे के पूर्ववर्ती कुछ मुख्यमंत्रियों का यह मानना था कि बतौर मुख्यमंत्री इन जिलो का दौरा करना शुभ नहीं है। जो मुख्यमंत्री इनका दौरा करता है वो दौरे के बाद मुख्यमंत्री नहीं रह जाता। संयोगवश ऐसा हुआ भी था। लेकिन योगी आदित्यनाथ ने इन टोटकों को न मानते हुए इन जिलों का निर्धारित दौरा किया और स्थापित मिथक को गलत साबित किया। इसी तरह जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होने शपथ ग्रहण कार्यक्रम को भव्य स्वरूप देने के लिए बड़े स्थान की तलाश शुरू कराई। आवश्यकता और निर्धारित योजनाओं के मुताबिक लखनऊ के शहीद पथ स्थित इकोना स्टेडियम मुफीद पाया गया। जन चर्चा शुरू हुई कि वहाँ शपथ ग्रहण कार्यक्रम होने से विपक्षियों को यह कहने का अवसर मिलेगा कि यह स्टेडियम उनके कार्यकाल में बना हुआ है। लेकिन इन सभी बातों को धता बताते हुए योगी मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण कार्यक्रम इकोना में ही हुआ। क्योंकि योगी आदित्यनाथ का मानना है कि काम को अंजाम देने का उद्देश्य जहां से पूरा होता है वो कार्य उसी जगह से संपादित होना चाहिए। इसी तरह लखनऊ के हृदयस्थल गोमती नगर में लोहिया पार्क और अंबेडकर पार्क के बीच एक अतुलनीय इमारत बनी है जिसका नाम है ;जयप्रकाश नारायण इन्टरनेशनल सेंटर’। समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार में इसे बनाया गया लेकिन पिछले वर्षों में सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। कयास लगाए गए कि सरकार अखिलेश की सरकार को मिलने वाली क्रेडिट से बचने के लिए ऐसा कर रही है। लेकिन जानकारी मिल रही है कि योगी सरकार ने सियासत की इस अवधारणा को गलत साबित करते हुए इस प्रोजेक्ट को पुनः संचालित करने का निर्णय लिया है। हो सकता है कि लखनऊ को एक नयी पहचान दिलाने में समर्थ भवन कला और स्थापत्य के इस अनूठे नमूने को सियासी नजर लगी ही हो। क्योंकि राज्य सरकार का जिस प्रोजेक्ट में 813 करोड़ रुपये लगे हों और उस पर शासन सत्ता की निगाह न पड़े ऐसा संभव नहीं है। लेकिन कोरोना आदि संकटों से उबरने के बाद जब मुख्यमंत्री की निगाह पड़ी तो अब इस पर काम शुरू हुआ।  इस इमारत में एक तरफ तो समाजवादी चिंतक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के व्यक्तित्व-कृतित्व का बोध कराने वाली साहित्य व कलाकृतियाँ प्रदर्शित है वही अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेल प्रतिस्पर्धाओं के शिक्षण-प्रशिक्षण का कार्य यहाँ बखूबी किया जा सकता है। यहाँ अंतर्राष्ट्रीय स्तर के स्वीमिंग पूल के साथ ही लान टेनिस कोर्ट, स्क्वेश, स्नूकर आदि खेलों की विश्वस्तरीय सुविधा है। सबसे नायाब तो यहाँ का कन्वेन्शन सेंटर है। फाइव स्टार स्टैंडर्ड का गेस्ट हाउस सहित समूची इमारत की स्थापत्य बेजोड़ है। विश्व प्रसिद्ध आर्किटेक्ट सौरभ गुप्त ने अपनी देख-रेख में इसे बनवाया है। प्रशासन ने इसके संचालन के लिए 35 करोड़ रुपये की मांग की है। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि अपने विकासपरक सोच के लिए अलग पहचान रखने वाले योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जिस तरह इस उपेक्षित इमारत का संज्ञान लिया है शीघ्र ही यह नायाब इमारत को आम जन के लिए समर्पित कर दिया जाएगा। इससे एक बार इस बात को बल मिलेगा कि विकास की शर्तों पर इस सरकार में सियासत का अहम स्थान नहीं है।

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