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सियासत की नई राह पर सपा !

By Shakti Prakash Shrivastva on May 13, 2024
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                                                                                                    शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव
पूरे देश में हो रहे लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक सियासी तूफान उत्तर प्रदेश में ही देखने को मिल रहा है। इसकी एक वजह ये भी है कि यहाँ से लोकसभा की सर्वाधिक अस्सी सीटे हैं। यहाँ एनडीए की तरफ से मुख्य जोर आजमाइश का जिम्मा बीजेपी के माथे है जबकि विपक्ष के आइएनडीआईए गठबंधन में सर्वाधिक माथा-पच्ची का जिम्मा समाजवादी पार्टी के पास है। इस बार विपक्ष के गठबंधन में सपा के साथ कांग्रेस पार्टी भी है। बीएसपी गठबंधन में नहीं है। जबकि पिछले चुनाव में बीएसपी और सपा का गठबंधन था। इस बार बीएसपी लोकसभा चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की जुगत में थी लेकिन ऐसा धरातल पर कही दिख नहीं रहा है। मुख्य मुकाबला सपा और बीजेपी के ही बीच देखने को मिल रहा है। अलबत्ता बीएसपी कहीं-कही बीजेपी को ही मजबूत करते दिख रही है। इसी के चलते सियासी गलियारे में ये भी चर्चा है कि बीएसपी की छिपी सियासी चाल बीजेपी को मजबूत करना है वरना वो भी आज आइएनडीआईए गठबंधन का हिस्सा होती। अगर वो गठबंधन का हिस्सा होती तो आज सूबे की सियासी तस्वीर कुछ और होती। फिलहाल सूबे का जो सूरतेहाल है उसके मुताबिक बीजेपी अपनी हेट्रिक फतह के लिए अपने पुराने ब्राह्मण, क्षत्रिय और कुर्मी समुदाय के वोटरों पर ही फोकस कर रही है जबकि सपा अपने पारंपरिक वोटर मुस्लिम और यादव से हटकर इस बार अन्य पिछड़ा वर्ग पर भी निगाह लगाए हुए है। मतलब साफ है कि सपा ने इस प्रतिष्ठापरक चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए अपने पुराने समीकरणों से इतर सियासत की एक नई राह थाम ली है।
उत्तर प्रदेश की अस्सी सीटों में से बीजेपी इस बार 75 सीटों पर चुनाव लड़ रही है जबकि शेष 5 सीटों पर उसके सहयोगी चुनाव लड़ रहे हैं।
इन उम्मीदवारों में 16 उम्मीदवार ब्राह्मण यानि 21%और 13 ठाकुर यानि 17% हैं। इस आंकड़ों के आधार पर कहा जा सकता है कि बीजेपी की यह रणनीति उसके 2019 वाली रणनीति को दोहराती हुई दिखाई दे रही है। दूसरी ओर सपा ने अपना सियासी फार्मूला इस बार बदल दिया है और यादव-मुस्लिम के मुकाबले कुर्मी, मौर्य, शाक्य, सैनी और कुशवाहा समुदायों से ज्यादा उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। यादवों के मामले में तो पार्टी ने अभिनव प्रयोग किया है। महज 5 यादव उम्मीदवार उतारे है और वो भी सभी मुलायम परिवार के ही हैं। कोई बाहरी नहीं है। इन 5 उम्मीदवारों में डिंपल यादव, अखिलेश यादव, आदित्य यादव, धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव है।
चूंकि पिछले 2019 के लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के साथ सपा का गठबंधन था। इसके बावजूद सपा को सिर्फ पांच सीटें मिलीं थी। इसी वजह से सपा को इस बार रणनीति में बदलाव करना पड़ा। 2019 में सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें मुख्य रूप से यादव और मुस्लिम उम्मीदवार थे। इस बार सपा 62 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन इस बार यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों को कम टिकट दिए हैं। यूपी में मुस्लिम आबादी लगभग 20% फीसदी है। इसके बावजूद सपा ने केवल 4 मुस्लिम उम्मीदवारों यानि 6.5% को ही टिकट दिया है। यादव ओबीसी का सबसे बड़ा समुदाय है। इसके बावजूद 2019 में जहां सपा ने 10 यादवों यानि 27% को उम्मीदवार बनाया था। जबकि इस बार सिर्फ 5 यादवों यानि 8% को ही टिकट दिया है। कुर्मी-पटेल मतदाताओं की संख्या 7% को देखते हुए सपा ने इस वर्ग से 10 उम्मीदवार यानि 16% को तवज्जो दी हैं।
हालांकि सियासी जानकारों का मानना है कि सपा के इस प्रयोग से संभव है कि इस चुनाव में कुछ फायदा मिल जाए लेकिन भविष्य में इससे पार्टी को नुकसान उठाना पड सकता है। सपा ने समाज में हिस्सेदारी को ध्यान में रखते हुए कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी समुदायों को इस बार ज्यादा वरीयता दी है। मुस्लिम-यादव की तुलना में इनके उम्मीदवार अधिक हैं। सपा का अपने मूल वोट बैंक से अन्य समुदायों की ओर जाना इसकी सामाजिक इंजीनियरिंग रणनीति का हिस्सा है। हालांकि यह अभी फायदेमंद लग रहा है लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव प्रतिकूल हो सकते हैं। बीजेपी ने भूमिहार, पंजाबी, पारसी, कश्यप, बनिया, यादव, तेली, धनगर, धानुक, वाल्मीकि, गोंड और कोरी यानि 1.3% प्रतिनिधित्व करने वाले समुदायों से एक-एक उम्मीदवार समेत विविध प्रकार के उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। सपा ने वाल्मीकि, गुर्जर, राजभर, भूमिहार, पाल और लोधी समुदाय से भी एक-एक उम्मीदवार मैदान में उतारा है, जो टिकट वितरण का 1.6% हिस्सा है।
विशेषज्ञों की मुताबिक बीजेपी और सपा जैसी दोनों ही पार्टियां इस बार मतदाताओं को अपनी ओर अधिकाधिक आकर्षित करने में लगी हैं। इसमें बीजेपी अपनी पिछली रणनीति पर कायम है जबकि सपा अधिक समावेशी दृष्टिकोण अपनाने हुए अपना लक्ष्य साधने की जुगत में है। अब देखना दिलचस्प होगा कि चुनाव में किसका प्रयोग सफल होता है।

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