Responsive Menu
Add more content here...
August 10, 2026
ब्रेकिंग न्यूज

Sign in

Sign up

योगी की बाल्मीकि चाल में फंसे अखिलेश !

By Shakti Prakash Shrivastva on October 21, 2025
0 177 Views

                                                  शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश की सियासत मूलतः मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इर्द-गिर्द ही घूमती नजर आती है। क्योंकि अगर सियासी तौर पर प्रदेश फतह की कवायद किसी दल को करनी है तो इन दोनों की क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को उसे समझना होगा। यही वजह है कि इन दोनों मे एक-दूसरे से आगे निकलने की होड सी मची रहती है। भरसक कोई एक दूसरे के बयान पर प्रतिक्रिया देने से पीछे नहीं रहना चाहता। बीते लोकसभा चुनाव में सपा मुखिया अखिलेश यादव ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यकों का पीडीए दांव चलकर एक बारगी योगी आदित्यनाथ समेत समूची बीजेपी को सकते में ला दिया था। वो बीजेपी जो अपनी लोकप्रियता की बदौलत केंद्र में अपने बूते तीसरी बार सरकार बनाने का सपना देख रही थी उसे अखिलेश के इस सियासी चाल ने सहयोगियों के समर्थन की जरूरत पैदा कर दी। लेकिन तभी से अखिलेश के इस दांव की काट की तलाश में योगी आदित्यनाथ लगे हुए थे। आखिरकार योगी आदित्यनाथ को महर्षि बाल्मीकि जयंती के रूप में एक अवसर मिल गया। फिर क्या था बिना बहुत कुछ सोचे सबसे पहले इस मौके पर पूरे प्रदेश में इस दिन को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया।

ऐसा ऐलान कर उन्होंने वाल्मीकि समाज को इसके जरिए समरूपता का संदेश देने की कोशिश की। इस मौके पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी ने जाति-पाति से ऊपर हरि भजन को महत्वपूर्ण बताया। राम मंदिर परिसर में बन रहे सप्तर्षि मंदिरों में महर्षि वाल्मीकि का भी मंदिर होने की बात को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान भी कर डाला। कोरोना काल में गरीब-दलित वर्ग के मुफ्त राशन योजना के जरिए मुख्यमंत्री योगी ने यूपी चुनाव 2022 में बड़ा असर डाला था। इसी प्रकार का असर यूपी चुनाव 2027 में भी दिखाने की कोशिश में हैं योगी।
अमूमन अभी तक के विधानसभा चुनावों में भावनात्मक मुद्दों की भी खासी अहमियत होती है। इसे आधार बनाकर जिस तरह से बीते लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने पीडीए के साथ-साथ संविधान के खतरे में होने की बात दलित समुदाय के बीच बैठाई, उसका असर चुनाव परिणाम में भी देखने को मिला। दलित वर्ग काफी हद तक इंडिया गठबंधन के साथ दिखा। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जाति-पाति से अलग होकर हिंदुत्व के मुद्दे पर वोटरों को एकजुट करने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

महर्षि वाल्मीकि का उदाहरण देते हुए मुख्यमंत्री योगी साफ कर रहे हैं की जाति-पाति कोई नहीं पूछता है, जो हरि को भजते हैं वह हरि के हैं। मतलब भगवान को पूजने वाले भगवान के लिए महत्वपूर्ण हैं। उनके लिए जाति-पाति का कोई महत्व नहीं है। मुख्यमंत्री योगी की इस नीति को अखिलेश यादव के पिछला दलित अल्पसंख्यक यानी पीडीए पॉलिटिक्स की काट के रूप में देखा जा रहा है।

देश के देव तुल्य ऋषियों की परंपरा ने हर कालखंड में समाज का मार्गदर्शन किया है। जैसे रामायण कालखंड में महर्षि वाल्मीकि, महाभारत कालखंड में महर्षि वेदव्यास, मध्यकाल में सद्गुरु रविदास जी महाराज ने समाज का मार्गदर्शन किया। ठीक इसी परंपरा में आजादी के बाद बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने समाज का मार्गदर्शन किया हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी इन्ही से प्रेरणा लेकर ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा देते हैं।

 

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *