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July 25, 2026
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सबकुछ लुटा, उद्धव फिर रामभरोसे!

By Shakti Prakash Shrivastva on July 25, 2026
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महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद पार्टी का चुनाव चिन्ह और बड़ा संगठनात्मक ढांचा पहले ही उनके हाथ से निकल चुका था। अब हाल में छह लोकसभा सांसदों के भी शिंदे गुट में जाने से उद्धव ठाकरे की राजनीतिक मुश्किलें और बढ़ गई हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या उद्धव के पास अब कोई ठोस राजनीतिक विकल्प बचा है, या फिर वह एक बार फिर अपनी पुरानी हिंदुत्व की राजनीति के सहारे पार्टी को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं।

इसी पृष्ठभूमि में उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र में ‘राम रक्षा’ अभियान की शुरुआत की है। राम मंदिर निर्माण के लिए जुटाए गए चंदे और कथित वित्तीय अनियमितताओं पर सवाल उठाकर उन्होंने भाजपा को सीधे चुनौती देने का प्रयास किया है। चांदी की ईंटों और मंदिर निर्माण से जुड़े चंदे का हिसाब मांगकर उन्होंने उस मुद्दे को छेड़ा है, जिसे भाजपा लंबे समय से अपनी सबसे बड़ी वैचारिक ताकत मानती रही है। यह कदम केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि हिंदुत्व की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता दोबारा स्थापित करने की कोशिश भी माना जा रहा है। क्योंकि उद्धव के पिता और शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे ने जब शिवसेना का गठन किया था तो पार्टी का स्वरुप उन्होंने हार्डकोर हिंदुत्व आधारित ही रखा था और उसी आधार पर उन्होंने पार्टी को देशव्यापी लोकप्रिय भी बनाया था.

हालांकि उद्धव ठाकरे ने इस बार अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव करते हुए केवल हिंदुत्व तक अपने को सीमित नहीं रखा है। बल्कि उन्होंने युवाओं और मध्यम वर्ग को भी साधने का प्रयास शुरू किया है। नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे छात्रों के समर्थन में उतरना, जंतर-मंतर जाकर सरकार की आलोचना करना और छात्रों को कानूनी सहायता देने की घोषणा करना इसी रणनीति का हिस्सा है। इसके माध्यम से उद्धव यह संदेश देना चाहते हैं कि उनकी राजनीति केवल भावनात्मक मुद्दों तक सीमित नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार और पारदर्शिता जैसे जनसरोकारों से भी जुड़ी है। इसके अलावा वो जन सरोकार के मुद्दे पर समानांतर कानूनी मोर्चे पर भी लड़ाई जारी रखना चाहते है। दल-बदल कानून के तहत बागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रही कार्यवाही को शिवसेना (यूबीटी) लगातार आगे बढ़ा रही है। उद्धव ठाकरे इस लड़ाई के जरिए यह राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं कि पार्टी छोड़ने वाले नेताओं ने केवल संगठन ही नहीं, बल्कि मतदाताओं के जनादेश के साथ भी विश्वासघात किया है। यदि अदालत से उन्हें भविष्य में राहत मिलती है तो यह उनके लिए बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।

हालांकि उद्धव ठाकरे के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। लगातार नेताओं के पार्टी छोड़ने से संगठन कमजोर हुआ है और कई क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं का मनोबल भी प्रभावित हुआ है। दूसरी ओर महाविकास आघाड़ी में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) जैसे सहयोगियों के साथ तालमेल बनाए रखते हुए हिंदुत्व की राजनीति करना भी आसान नहीं है। यदि वह हिंदुत्व पर अधिक जोर देते हैं तो सहयोगी दल असहज हो सकते हैं, जबकि इससे दूरी बनाने पर पारंपरिक शिवसैनिक नाराज हो सकते हैं।

राजनीतिक गलियारों में राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के संभावित राजनीतिक समीकरणों की चर्चा भी तेज है। यदि भविष्य में दोनों दल किसी साझा रणनीति पर सहमत होते हैं तो मुंबई, ठाणे और कोंकण क्षेत्र में मराठी वोटों का नया ध्रुवीकरण देखने को मिल सकता है। हालांकि फिलहाल यह केवल राजनीतिक अटकलों के स्तर पर है।

कुल मिलाकर, मौजूदा परिस्थितियां बताती हैं कि उद्धव ठाकरे के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती है। संगठन कमजोर है, नेता साथ छोड़ रहे हैं और चुनावी जमीन भी पहले जैसी नहीं रही। ऐसे में उनका पूरा दांव एक बार फिर हिंदुत्व, राम मंदिर और जनभावनाओं से जुड़े मुद्दों पर टिकता दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि महाराष्ट्र की राजनीति में यह चर्चा तेज हो गई है कि सबकुछ लुटा, उद्धव फिर रामभरोसे!” अब यह रणनीति उन्हें राजनीतिक पुनर्जीवन देती है या नहीं, इसका फैसला आने वाले बीएमसी और विधानसभा चुनावों में जनता करेगी।

 

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