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‘गठबंधन’ की मिट्टी पलीत करेगा ये…

By Shakti Prakash Shrivastva on December 4, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

देश में हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जिस तरह चार राज्यों के परिणाम आए हैं उससे सबसे अधिक यदि किसी के भविष्य पर ग्रहण लगा है तो वो है नवगठित विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए के भविष्य पर। हालांकि परिणाम से भी ज्यादा प्रभाव गठबंधन के नेताओं के आ रहे बयानों का असर होते दिख रहा है। परिणाम के मुताबिक जिस तरह से चार राज्यों में बीजेपी की सरकार बन रही है उससे गठबंधन के नेताओं ने बीजेपी से ज्यादा अपने गठबंधन सहयोगियों पर ही कटाक्ष करने शुरू कर दिये है। नेताओं के ये कटाक्ष ही गठबंधन को काल के गाल में ले जाने का काम करेगा। बिहार के मुख्यमंत्री और विपक्षी दलों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाने वाले नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने बीजेपी की इस जीत को गठबंधन आईएनडीआईए की हार मानने से इंकार कर दिया है। पार्टी की मुताबिक यह हार कांग्रेस पार्टी की हार है न की गठबंधन की हार। इस चुनाव में गठबंधन के सदस्यों को साथ में नहीं लेकर कांग्रेस ने बड़ी गलती की है। अब कांग्रेस को यह एहसास हो गया होगा कि वह अकेले बीजेपी को शिकस्त नही दे सकती है। उसे कहीं न कही अब पछतावा हो रहा होगा। लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गयी खेत।

जनता दल यूनाइटेड के मुख्य प्रवक्ता केसी त्यागी की मुताबिक  यह चुनाव परिणाम और बेहतर भी हो सकते थे। इसको गठबंधन की हार के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह चुनाव सिर्फ कांग्रेस पार्टी लड़ रही थी। क्योंकि इन सभी जगहों पर कांग्रेस का प्रभाव रहा है। इन तीनों राज्यों में कांग्रेस की ही सरकार थी। इसलिए इस परिणाम को बीजेपी की जीत और कांग्रेस की हार की तरह मानना चाहिए। इससे गठबंधन का कोई लेना-देना नहीं है। जनता दल यूनाइटेड, सपा और राजद ने कांग्रेस के साथ आने की कोशिश की थी लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं होने दिया। लेकिन यह तय हो गया है कि कांग्रेस बीजेपी का अकेले सफाया नहीं कर सकती। अब चुनावों में क्षेत्रीय दल अपने-अपने राज्यों में बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। इसे कांग्रेस को नए सिरे से सम्झना होगा। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 6 दिसंबर को गठबंधन की विशेष बैठक बुलाई है। गठबंधन की इस बैठक में भले ही हार की समीक्षा होगी लेकिन उससे ज्यादा अहम है कि गठबंधन के सहयोगी आपस में एकदूसरे पर टीका-टिप्पणी करने से बचे। क्योंकि ऐसा न करने से कांग्रेस जो गठबंधन की सबसे मजबूत पार्टी है उसके नेताओं में आक्रोश बढ़ना स्वाभाविक है। इससे गठबंधन का भविष्य अंधकारमय हो सकता है। जबकि इन चुनाव परिणामो ने यह जाता दिया है की क्षेत्रीय दलों का भविष्य राष्ट्रीय फ़लक पर बेहद सीमित है।

 

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