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August 3, 2026
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विधानसभा के लघु सत्र से डरे क्यों अखिलेश!

By Shakti Prakash Shrivastva on August 4, 2026
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

उत्तर प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र इस बार महज़ चार दिनों का रखा गया है। 3 अगस्त से शुरू होकर 6 अगस्त तक चलने वाला यह सत्र अवधि में भले छोटा हो, लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सत्र शुरू होने से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने आवास पर भाजपा सचेतक दल की बैठक कर रणनीति तय की, वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने सत्र की अवधि को लेकर सरकार पर तीखा हमला बोल दिया। सवाल यह है कि क्या विपक्ष वास्तव में सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है, या उसे इस बात की चिंता है कि कहीं योगी सरकार इन चार दिनों में 2027 के चुनावी समीकरण बदलने वाला कोई बड़ा कदम न उठा दे?

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर सरकार का व्यंग्यात्मक अंदाज में घेराव करते हुए लिखा कि “चार दिन की सरकार बची है, इसलिए विधानसभा का सत्र भी चार दिन का रखा गया है।” उन्होंने चारों दिनों का अलग-अलग राजनीतिक एजेंडा बताते हुए सरकार पर अयोध्या, छात्र आंदोलन और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों से भागने का आरोप लगाया। अखिलेश ने यहां तक दावा कर दिया कि भाजपा को अपनी हार का आभास हो चुका है, इसलिए वह विधानसभा को महत्व नहीं दे रही है।

इसी कड़ी में सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव ने भी सरकार पर निशाना साधा। उनका कहना है कि जनता के सवालों से बचने के लिए सदन की अवधि कम कर दी गई है। उन्होंने महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याओं, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की बात कही और भरोसा दिलाया कि समाजवादी पार्टी सदन में जनता की आवाज पूरी मजबूती से उठाएगी।

हालांकि सत्ता पक्ष का नजरिया इससे बिल्कुल अलग दिखाई देता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्र शुरू होने से पहले सभी भाजपा विधायकों की अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित करने और सदन के सुचारु संचालन के लिए विशेष रणनीति बनाई है। इससे यह संकेत मिल रहे हैं कि सरकार इस छोटे से सत्र में कुछ महत्वपूर्ण विधायी कार्य पूरे करने के मूड में है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि सरकार कोई ऐसा फैसला या विधेयक ला सकती है जिसका असर सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है।

यही संभावना विपक्ष की बेचैनी का सबसे बड़ा कारण मानी जा रही है। सामान्यतः छोटे सत्रों में सीमित कार्यसूची रहती है, लेकिन जब सरकार पहले से रणनीतिक तैयारी करे और विपक्ष लगातार आशंका जताए, तो राजनीतिक संदेश अलग ही निकलता है। अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के लगातार हमले भी इस बात का संकेत देते हैं कि वे सरकार के संभावित कदमों पर नजर बनाए हुए हैं।

अब निगाहें विधानसभा के इन चार दिनों पर टिकी हैं। यदि सरकार कोई बड़ा विधेयक, नई योजना या महत्वपूर्ण राजनीतिक घोषणा लेकर आती है, तो विपक्ष की आशंकाओं को बल मिलेगा। वहीं यदि सत्र केवल सामान्य सरकारी कामकाज तक सीमित रहता है, तो सपा के आरोप राजनीतिक बयानबाजी भर माने जाएंगे। इतना तय है कि अवधि में छोटा यह मानसून सत्र उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा संदेश देने वाला साबित हो सकता है और इसकी गूंज 2027 के चुनावी रण तक सुनाई दे सकती है।

 

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