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October 9, 2026
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मुंबई हुई पराई!

By Shakti Prakash Shrivastva on January 18, 2026
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                                                 शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

महाराष्ट्र की सियासत शुरू से ही मराठी और गैर मराठी मानुष के बीच की रही है। लेकिन जिस तरह से इस बार नगर निकाय के चुनाव परिणाम आया हैं उससे तो ऐसा लगता है कि अब वहाँ भी मराठी लोगों की तुलना में अन्य प्रदेशों से आकर बसे लोगों का प्रभाव बढ़ रहा है। क्योंकि सामूहिक तौर पर आए चुनाव परिणामों की समीक्षा करें तो लगेगा कि प्रदेश की सियासत में स्थानीय मराठी लोगों की हिमायती या ये कहें उनकी सियासत करने वाले शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना जैसी सियासी पार्टियों का हश्र अपेक्षा के विपरीत रहा। पार्टी टूटने के बाद अस्तित्व में आयी शिवसेना (उद्धव ठाकरे) की तो इज्जत फिर भी बीएमसी यानि बृह्न्मुंबई नगर निगम ने बचा ली लेकिन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरत) और महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का तो कहें सूपडा ही साफ हो गया। भारतीय जनता पार्टी जिसको प्रदेश में स्थानीय सियासत को साधने के लिए शिवसेना जैसी पार्टी का दामन थामे रहना मजबूरी हुआ करती थी। आज चुनावी नतीजों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। राज्य की तुलना में सिर्फ बृह्न्मुंबई नगर निगम के नतीजों पर ही गौर करें तो यहाँ भी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी बीजेपी। बीजेपी को यहाँ 89 सीटों पर विजय मिली। इस तरह यहाँ बीजेपी का जीतना यह प्रमाणित करता है कि मुंबई की स्थानीय सियासत में अन्य प्रदेशों से आए बाहरियों का वर्चस्व बढ़ रहा है। मतलब मुंबई हुई पराई।

सिर्फ बीएमसी मतलब बृह्न्मुंबई नगर निगम पर पिछले ढाई दशक से भी ऊपर के वक्त तक हार्डकोर मराठी मानुष और हिन्दुत्व की बोली बोलने वाले शिवसेना यानि ठाकरे परिवार का कब्जा रहा। लेकिन इतने वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ कि इस बार 227 सीटों वाली निगम में बीजेपी और उसके सहयोगी शिवसेना बहुमत के आंकड़े से कुछ अधिक 118 पर विजयी हुए। जबकि मराठी मुंबई का मेयर बने सरीखे नारों ने शिवसेना (उद्धव ठाकरे) को मजबूत बनाने की बजाय कमजोर किया। यहाँ मतलब साफ है कि उत्तर भारतीयों को तिरस्कार भरी नजरों से देखने वालों मनसे प्रमुख राज ठाकरे को मात्र छह सीटों से संतोष करना पड़ा। ऐसा लगता है कि मुंबई वालों को मराठी मानुष और बाहरियों को हेय दृष्टि से देखने वाले राज ठाकरे की बजाय मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस की माइक्रो पालिटिकल स्ट्रेटजी पसंद आई। उन्होने भर-भर कर वोट बीजेपी को दिये। वहीं उत्तर भारतीयों यानि यूपी से जाकर मुंबई में प्रचार करने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बाहुबली पूर्व सांसद धनंजय सिंह को वहाँ के मतदाताओं ने खूब पसंद किया। इनके प्रचार वाले अधिकांश क्षेत्रों में बीजेपी को जीत मिली। मतदाताओं के इसी पसंद का नतीजा है कि बीजेपी ने महाराष्ट्र की प्रमुख विपक्षी 315 सीटों वाली पार्टी कांग्रेस से चार गुना और दूसरी सबसे बड़ी 394 सीटों वाली पार्टी एकनाथ शिंदे की शिवसेना से तीन गुना अधिक सीटें जीती।

इन नतीजों ने न केवल आगे राज्य की राजनीति में शक्ति-संतुलन का संकेत दिया है बल्कि यह भी साफ़ किया है कि आने वाले चुनावों में पूर्व के स्थापित सियासी समीकरण बदलेंगे। देश के कई राज्यों से भी अधिक सालाना बजट वाले बीएमसी जैसे बड़े नगर निगम के नतीजों को राज्य की राजनीति का मूड इंडिकेटर माना जाता है और इन्हें अक्सर आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों से पहले एक अहम संकेत के तौर पर देखा जाता है। इसलिए इनके नतीजों ने भी इस बार संकेत दे दिया है कि अब मुंबई में स्थानीय और बाहरी वाली सियासत के फार्मूला का अंत आ गया है।

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