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राहुल जी, ऐसे तो मिट जाएगी कांग्रेस !

By Shakti Prakash Shrivastva on February 26, 2025
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                                                                                                शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

राहुल गांधी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। पार्टी के अध्यक्ष रह चुके है वर्तमान में लोकसभा में विपक्ष के नेता है। लोकसभा में उनकी पार्टी यानि कांग्रेस के कुल निन्यानबे सदस्य है। यह अलग बात है कि इस निन्यानबे के आँकड़े में कांग्रेस की अपेक्षा सर्वाधिक योगदान क्षेत्रीय दलों का है। लेकिन हाल के दिनों में लगातार यह देखा जा रहा है कि चुनाव-दर-चुनाव कांग्रेस की हालत पतली मतलब कमजोर होती जा रही है। इसका बहुत बड़ा कारण राहुल गांधी द्वारा लिए गए निर्णय है। समय पर निर्णय न लिए जाने और गलत लिए गए निर्णयों के चलते ही यह दिन कांग्रेस को देखना पड रहा है। देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री देने वाले और सर्वाधिक समय तक देश की सरकार पर काबिज रहने वाली पार्टी का आज ये हाल है कि दिल्ली सहित कई ऐसे प्रदेश है जिनकी विधानसभाओं में कांग्रेस का एक भी प्रतिनिधि नहीं है।

दिल्ली की ही बात करे तो पिछले तीन चुनावों से यहाँ की विधानसभा और लोकसभा की सीटों पर पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका है। ये हालत उस दिल्ली की है जहां सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियका गांधी समेत राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सरीखे कई दिग्गज नेता निवास करते हैं।

इन परिस्थितियों के पीछे राहुल गांधी के निर्णयों को जिम्मेदार इसलिए माना जा रहा है क्योंकि दिल्ली चुनाव में अंत तक राहुल या उनकी पार्टी काँग्रेस यह तय नहीं कर पा रही थी कि आम आदमी पार्टी साथी है या विरोधी। कमोबेश यही हाल पश्चिम बंगाल की है। वहाँ होने वाले विधानसभा चुनाव के बहुत पहले अभी तृणमूल कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। लेकिन जहां तक राहुल गांधी का सवाल है वो अभी भी यह तय नहीं कर पा रहे है कि तृणमूल काँग्रेस उनकी साथी है या विरोधी।

लोकसभा में राहुल गांधी जिस नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर बैठे है इसी पर पहले कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी बैठा करते थे। अधीर रंजन पश्चिम बंगाल से सांसद थे। वो पश्चिम बंगाल में लगातार कांग्रेस को मजबूत करने की कवायद में जुटे हुए थे। इसके चलते वो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी की आँखों में चुभ रहे थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में ममता ने व्यक्तिगत तौर पर रुचि ले कर ऐसा किया कि अधीर चुनाव हार गए। आज काँग्रेस में उनका पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं है। उन्हे पार्टी आलाकमान ने अकेला छोड़ दिया है। बिहार में लालू प्रसाद यादव हो या जम्मू कश्मीर में उमर अब्दुलला सभी क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपो ने राहुल गांधी के अनिर्णय वाली आदत का भरपूर इस्तेमाल किया। ऐसे में राहुल गांधी को चाहिए कि सबसे पहले तो यह चिन्हित करे कि किस प्रदेश में कौन सी पार्टी उनकी पक्षधर है और कौन सी पार्टी विरोधी है। उसके बाद चुनाव चाहे विधानसभाओं का हो या लोकसभा का उनसे छः-सात महीने पहले ही उन दलों के साथ बैठकर रणनीति तय करे। इससे सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि कोई दल या तो आपके साथ चुनाव लड़ेगा या अलग से लड़ेगा यह स्पष्ट हो जाएगा। इससे चुनाव में पार्टी कार्यकर्ताओं को सबसे सहूलियत होगी। वो अपना स्टैंड तय कर सकेंगे। अनिर्णय के चलते पार्टी को एक तो परिणाम मे हार मिलने की संभावना रहती है दूसरे कार्यकर्ताओं का दूर होने का खतरा रहता है। दिल्ली के चुनाव को ही ले वहाँ कई ऐसे क्षेत्र थे जहां पार्टी को प्रत्याशियों तक का टोटा था। इसके अलावा दर्जन भर चुनाव क्षेत्र ऐसे थे जहां कांग्रेस यदि आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ती तो वहा आप या काँग्रेस को विजयी होना तय था। ऐसा होता तो सरकार भी तीसरी बार आम आदमी पार्टी की ही बनती।

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