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श्रद्धांजलि :जुगानी जी, जिनका ओढ़ना-बिछवना था भोजपुरी

By Shakti Prakash Shrivastva on February 16, 2025
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                                                                            शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

भोजपुरी के सशक्त हस्ताक्षर जुगानी भाई यानि आकाशवाणी गोरखपुर के कार्यक्रम अधिशासी पद से सेवानिवृत्त हुए रवींद्र श्रीवास्तव का 14 फरवरी 2025 को देहावसान हो गया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित उनसे व उनकी विधा से जुड़े अनेकानेक मनीषियों के श्रद्धांजलि संदेश मीडिया मंचों पर अपनी उपस्थिति करा रहे है। ऐसे में यह बताना समीचीन होगा कि सही मायने में साहित्य-संस्कार के अद्वितीय शिल्पी थे जुगानी भाई। उनके रग-रग में भोजपुरी का वास था। मतलब उनके बातचीत की शैली, व्यवहार, भाषा, लेखन सहित वेश-भूषा, खान-पान तक भोजपुरिया प्रभावित था। ऐसा मै महज इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि उनको रेडियो मे सुना या किताबों-समाचार पत्रों में पढ़ा है। बल्कि इसलिए कि उनके कुछ हद तक नजदीक रहने का सौभाग्य भी मिला है। उस दौरान मिले व्यावहारिक अनुभव के आधार पर ऐसा वर्णन कर पा रहा हूँ। बात लगभग ढाई दशक पहले की है मै गोरखपुर से प्रकाशित समाचार पत्र राष्ट्रीय सहारा में फीचर पृष्ठ की जिम्मेदारी संभाल रहा था। आकाशवाणी में उनसे मुलाकात हुई। उस मुलाकात में ही उन्होंने मुझसे जो स्नेहवत अभिभावकत्व वाला रिश्ता बनाया वो अंत तक बना रहा। लखनऊ-गोरखपुर के बीच मेरी व्यावसायिक घुड़-दौड़ के चलते मेरे दुर्भाग्यवश हाल के दशक में उनसे मिलने की आवृत्ति बहुत अधिक नहीं रही। लेकिन भोजपुरी के प्रति लगाव के चलते मेरा समर्पण उनके प्रति सदैव औरों से अलग रहा। साथ बैठने पर रचनात्मक पहलुओं पर लंबी बातचीत चलती थी। दफ्तर हो या घर ऐसा एक भाव से होता था। घर होने पर बीच में चाय के साथ चना-चबैना भी आदरणीय भाभी जी के सौजन्य से मिल जाता था। एक बार अखबार के संपादक आदरणीय रामेन्द्र सिन्हा और मेरे अनुरोध पर अखबार के लिए भोजपुरी भाषा में एक स्तम्भ लिखने की उन्होंने सहमति दी। उनका लिखा वह स्तम्भ बेंगुची चलल ठुकावे नाल के नाम से दशकाधिक समय तक प्रकाशित होता रहा। जिस तरह आवाज की दुनिया रेडियों में उनके श्रोता थे उसी तरह उनके चलते अखबार में भी एक अलग पाठक वर्ग तैयार हो गया था। हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार डॉ विद्या निवास मिश्र जब प्रसार भारती के अध्यक्ष हुए तो हमलोगों ने जुगानी भाई के ही माध्यम से उनसे गोरखपुर आकाशवाणी केंद्र से एक भोजपुरी में समाचार कार्यक्रम की शुरुआत करने का अनुरोध किया। जिसे डॉ मिश्र ने शुरू भी करवा दिया। बीतल हफ्ता के नाम से साप्ताहिक कार्यक्रम था जिसमें हफ्ते भर के समाचारों का सार होता था। मुझे भी जिम्मेदारी मिली। उसे लिखने और पढ़ने की। बहुत दिनों तक उसे किया भी।

चूंकि गोरखपुर और आसपास का इलाका भोजपुरिया है और यहीं पर जुगानी जी भोजपुरी को आत्मसात किये रहे लिहाजा उन्हे इलाकाई कला, साहित्य, संस्कार सहित इतिहास-भूगोल का गहन अध्ययन भी था और अनुभव भी। सही अर्थों में उन्हे भोजपुरी का इनसाइकलोंपीड़िया कहा जा सकता है। उन्होंने आकाशवाणी सहित भोजपुरी के ब्रांड एंबेस्डर के रूप में देश ही नहीं दुनियाभर  में ख्याति अर्जित की।

उनके इस विशिष्टता का मुझे भी लाभ मिला। मै जब गोरखपुर के इकलौते स्टूडियो आधारित क्षेत्रीय टीवी चैनल सहारा टीवी का ब्यूरो प्रमुख बनाया गया तो मेरे जिम्मे मेरे संस्थान खासकर चैनल प्रमुख प्रभात डबराल जी द्वारा अलग किस्म की एक जिम्मेदारी दी गई। जिम्मेदारी थी कि यहाँ न्यूज से इतर फीचर में कुछ अलग प्रयोग किया जाए। इसमे मुझे आदरणीय जुगानी भाई से बहुत मदद मिली। कथाकार मुंशी प्रेमचंद, शायर फिराक गोरखपुरी, चौरीचौरा, लोकगीत, लोकसंगीत सहित अनेकानेक क्षेत्रों में मैंने इनके सहयोग से फीचर बनाया। जो न केवल मेरे उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड चैनल बल्कि आधा दर्जन से अधिक संस्थान के अन्य सहयोगी चैनलों में भी प्रसारित होते रहे। मेरे साथ उनके अपनापन का ही उदाहरण है कि जब-जब वो किसी किताब की तैयारी करते थे तो मुझे भी उसकी जानकारी देते थे।  लिखने-पढ़ने और बोलने में भोजपुरी को जीने वाले जुगानी भाई खाने-पीने में भी खाँटी भोजपुरिया थे। शुरुआती दिनों में भोजपुरी कवि और औरतनामा जैसी कालजयी रचना करने वाले भाई मुकेश आचार्य के घर पर जमावड़ा होता था। जुगानी भाई के अनुरोध पर मुझे भी बुलाया जाता था। वहाँ मुकेशजी की पत्नी के भोजपुरिया अपनापन से तैयार भोजपुरिया व्यंजन लिट्टी-चोखा, दाल आदि का भूख से अधिक खायन होता था। वह क्षण आज भी हूबहू याद ही नहीं आता महसूस होता है। सबसे अधिक सभी जमे लोगों का भोजपुरिया अपनापन। पिछले दिनों यूट्यूब पर भोजपुरिया भाइयों विकास और नरेंद्र के चैनल पर जुगानी भाई का एक साक्षात्कार देख मन में एक मुलाकात रिकार्ड करने का हुआ था लेकिन अफसोस मेरी अन्य कई योजनाओं की भांति यह भी अंजाम तक नहीं पहुँच सकी। बहरहाल ऐसे बहुतेरी यादें है जो अब यादों में यूँ ही बनी रहेंगी।

रेखि बन-बन मिटल लिलारे पर, उम्र खासे लगलि दुवारे पर.

सांच के आईना में देखीं त, एक त झूठ, उहो कपारे पर….

रविद्र श्रीवास्तव उर्फ जुगानी भाई आज इस दुनियां को अलविदा कह गए लेकिन उनकी कालजयी रचनाएं हमेशा उन्हें जिंदा रखेंगी..

श्रेष्ठ पूजनीय को शत-शत नमन

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