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आसान नहीं योगी को हटाना !

By Shakti Prakash Shrivastva on June 23, 2024
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                                                                                   शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

लोकसभा चुनाव के पहले से ही सियासी गलियारों में इस बात की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी कि अगर केंद्र में मजबूत बीजेपी सरकार बनती है तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छुट्टी हो जाएगी। मतलब उन्हे उनके मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी से मुक्त करते हुए कहीं और बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी। उस समय इस बात की उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी सम्मानजनक सीटें हासिल करेगी और केंद्र में मोदी सरकार बहुमत के साथ तीसरी बार वापसी करेगी। लेकिन जब चुनाव के नतीजे आए तो उसमें परिणाम चौंकाने वाले आ गए। योगी आदित्यनाथ के काम और तेवर को मतदाताओं ने सिरे से अपेक्षित सम्मान नहीं दिया। हालांकि ये अंदर की बात है कि प्रदेश में मिली बीजेपी की अपेक्षाकृत कम सीटों के पीछे योगी से इतर दूसरी वजहें है। कारण कुछ भी हो लेकिन प्रदेश में प्रतिष्ठापरक अयोध्या सीट समेत बीजेपी ने पहले की तुलना में लगभग आधी सीटें गंवा दीं। पिछले बार की 62 की तुलना में इस बार 32 उम्मीदवार ही ऐसे थे पार्टी के, जिन्होंने जीत कर संसद की दहलीज पार की। ऐसे में योगी को यूपी से बेदखल करने वाली चर्चा की वजहें बदल गई। अब इस बात की चर्चा होने लगी कि योगी के रहते पार्टी का परिणाम इतना निराशाजनक रहा। इसलिए योगी को प्रदेश की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया जाए। लेकिन मीडिया की चर्चा और सियासी गलियारों की चर्चा से इतर कुछ ऐसे तथ्य है या तर्क है जो यह प्रमाणित करते है कि योगी आदित्यनाथ को हटाना इतना आसान नहीं है।

याद करिए कि उत्तराखंड, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ सरीखे प्रदेशों में जिस तरह से स्थापित सियासी प्रोटोकाल के विपरीत मुख्यमंत्री बनाए या बदले गए उस तरह से ही योगी को बदलने के भी प्रयास हुए। ये कह सकते है कि बदलने की परिस्थितियाँ गढ़ने की कोशिश की गई। लेकिन योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली से जो परिचित है वो जानते है कि यही उनकी विशेषता भी मानी जाती है और इसे ही उनकी कमजोरी में भी शुमार किया जाता है कि वो हालात पर रुककर मनन करने की बजाय अपने लय में काम करते हुए विचार चिंतन, विश्लेषण और निर्णय करते हैं। याद करिए जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की सहमति से प्रधानमंत्री कार्यालय यानि पीएमओ में कार्यरत रहे आईएएस अधिकारी ए. के. शर्मा ब्यूरोक्रेसी छोड सियासी पारी खेलने उत्तर प्रदेश का रुख किए थे तो सियासी गलियारे समेत मीडिया में इस बात की खूब चर्चा हुई कि उन्हे उपमुख्यमंत्री बनाया जाएगा। काफी दिनों तक लगा कि बीजेपी के अंदरखाने में स्थितियाँ तनावपूर्ण है कुछ न कुछ बदलाव होगा ही होगा। लेकिन अंततः हुआ ये कि उन्हे प्रदेश संगठन में समायोजित किया गया व विधान परिषद की सदस्यता देते हुए उन्हे पावर बख्शी गई। बाद में उन्हे ऊर्जा जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय का मंत्री बना बीच का समन्वय बनाया गया। इसी तरह घोसी उपचुनाव के बाद गृहमंत्री अमित शाह का आशीर्वाद मिलने के बाद भी सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर और दारा सिंह चौहान को मंत्री बनने के लिए सब्र की इंतहा दर्शानी पड़ी। ये सब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की विशिष्ट शैली और आसानी से समझौता न करने वाली आदतों के चलते हुआ। इतना ही नहीं आज योगी आदित्यनाथ के छवि और लोकप्रियता की स्वीकार्यता पूरे देश में है कहना अतिशयोक्ति न होगी। इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयं संघ की प्रियता भी योगी को मजबूती प्रदान करता है। ऐसे में मौजूदा सियासी परिदृश्य में योगी आदित्यनाथ को बदलना तो दूर छेडना भी बीजेपी के लिए आत्मघाती कदम साबित होगा।

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