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आध्यात्म और जनसरोकारी जिम्मेदारियां दोनों के ही प्रति सजग रहते हैं मुख्यमंत्री ‘योगी’

By Shakti Prakash Shrivastva on May 21, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

              योगी आदित्यनाथ एक संत के रूप में जहां आध्यात्मिक परंपराओं का बखूबी निर्वहन करते हैं वैसे ही बतौर मुख्यमंत्री अपने सभी सामाजिक-प्रशासनिक जिम्मेदारियों को भी समय से  पूरा करने में विश्वास रखते है। यही वजह है कि श्री गोरखनाथ मंदिर में मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठा के अवसर पर आयोजित सात दिवसीय श्री मद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के पाँचवे दिन यानि 18 मई को शामिल होकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने न केवल कथाश्रवण किया बल्कि श्री लक्ष्मी नारायण यज्ञ के चारों द्वारों, वेदियों का पूजन करते हुए आहुति भी डाली। दूसरे दिन यानि शनिवार की सुबह पूर्व निर्धारित पूजन-अर्चनोंपरांत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जनता दर्शन कार्यक्रम में शामिल हो मौजूद लगभग चार सौ की संख्या में उपस्थित पीड़ितों से व्यक्तिगत मिल-मिलकर उनकी समस्याओं के निराकरण की व्यवस्था दी। किसी अपरिहार्य स्थिति को छोड़कर मुख्यमंत्री के गोरखपुर में मौजूद रहने की स्थिति में नित्य सुबह गोरखनाथ मंदिर परिसर में जनता दर्शन कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। इस कार्यक्रम में जिले स्तर के प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहते हैं। मुख्यमंत्री कार्यक्रम के दौरान एक-एक पीड़ितों से मिल उनसे उनके लिखित प्रार्थना पत्र ले मौके पर ही उसके हर संभव निस्तारण की व्यवस्था देते हैं। यह कार्यक्रम उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से आज तक लगभग अनवरत आयोजित हो रहा है। हालांकि मुख्यमंत्री बनने के पहले भी इस तरह का आयोजन होता था। उस समय उसका स्वरूप कुछ और होता था। पहले पीड़ित गोरखनाथ मंदिर स्थित इनके कार्यालय पहुंचते थे। कार्यालय में नित सुबह 9 बजे बतौर सांसद योगी आदित्यनाथ बैठ जाते थे। वहाँ भी पीड़ितों के न्याय दिलाने का काम उनके द्वारा किया जाता था। कहने का आशय ये है कि मुख्यमंत्री बनने से पहले और बाद में बतौर सांसद भी योगी आदित्यनाथ की दिनचर्या कमोबेश एक सी थी। यही उनकी व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी है और इलाके में उनके व्यापक जनाधार का कारण भी। 1998 से लगातार 2014 तक गोरखपुर से सांसद चुना जाना उनकी इसी कार्यशैली का प्रमाण है। बिना किसी पूर्व राजनीतिक गलियारे में हुए किसी चर्चा के 2017 में जब उत्तर प्रदेश में बनी बीजेपी सरकार की कमान योगी आदित्यनाथ को दी गई। तो बेशक योगी के पास उस समय एक मुख्यमंत्री की कार्य अपेक्षाओं के अनुकूल अनुभव नहीं था लेकिन गोरखपुर में बतौर सांसद कमोबेश उसी तरह की प्रशासनिक-सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव और उससे मिले अनुभव की पूंजी उनके पास थी। गोरक्षपीठ जैसे नाथ संप्रदाय के देश के प्रतिष्ठित पीठ के पीठाधीश्वर के रूप में उनका अनुभव भी यहा काम आया। पीठ की व्यवस्था में संचालित कई दर्जन शैक्षिक संस्थान, अस्पताल आदि के प्रबंधन का अनुभव भी काम आया। आज यदि यह कहें कि योगी एक परिपक्व राजनेता और संत दोनों ही भूमिका में पूरी तरह सफल हैं तो अतिशयोक्ति न होगी।

 

 

 

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