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बागी गुट ही असली ‘शिवसेना’

By Shakti Prakash Shrivastva on February 20, 2023
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शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव

बाला साहब ठाकरे की शिवसेना से बगावत कर एकनाथ शिंदे ने न केवल पिछले साल महाराष्ट्र में अपनी अगुवाई में सरकार बनाई बल्कि अब शिवसेना के असली मालिक भी बन गए। इसमें अहम भूमिका निभाई चुनाव आयोग ने। शिवसेना के दोनों ही गुटों में शिवसेना नाम और उसके चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद का शुक्रवार को चुनाव आयोग ने पटाक्षेप कर दिया। अपने 78 पृष्ठीय आदेश में आयोग ने माना कि शिवसेना का मौजूदा संविधान अलोकतांत्रिक है। लिहाजा शिंदे गुट के पास बहुमत होने की वजह से आयोग ने शिवसेना नाम और उसका चुनाव चिन्ह तीर-कमान दोनों ही शिंदे गुट को दे दिया।

चुनाव आयोग ने अपने आदेश में विस्तार से जिक्र करते हुए कहा कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिंदे गुट के पास 55 में से 40 विधायकों का समर्थन है। इस गुट के पास पार्टी के कुल 47,82,440 वोट में से 36,57,327 वोट लगभग 76 फीसद का समर्थन हासिल है। जबकि दूसरे उद्धव गुट के पास 55 में महज 15 विधायकों के साथ 11,25,113 वोट का ही समर्थन है। यही वजह है कि संख्या बल में अधिक समर्थन के आधार पर शिंदे गुट को शिवसेना का नाम और चुनाव निशान दे दिया गया।

शिंदे गुट ने चुनाव आयोग के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह बाला साहेब ठाकरे और आनंद दिघे के विचारों की जीत हैं। सत्य की जीत है। चुनाव आयोग को इस निर्णय के लिए धन्यवाद दिया। जबकि पार्टी के उद्धव गुट के सांसद संजय राउत ने आदेश को लोकतंत्र की हत्या करार दिया।
1968 का इलेक्शन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर चुनाव आयोग (ईसी) को किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर फैसला लेने की छूट देता है। इसी के तहत चुनाव चिह्न और नाम संबंधी निर्णय के लिए आयोग पूरी तरह स्वतंत्र है।

इसके पहले भी देश की सियासत में कई ऐसे अवसर आए हैं जब आयोग ने कभी बागी गुट को मान्यता दी तो कभी दोनों गुटों को नया चुनाव चिन्ह दिया है। 1969 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्कासन पर उनके गुट को कांग्रेस आर नाम मिला था। 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा की पार्टी को दो बैल की जगह गाय और बछड़ा चुनाव चिह्न मिला। बाद में यही गुट ही असली कांग्रेस बन गया। इसी तरह 1995 में एन चन्द्रबाबू नायडू और 2016 में अखिलेश यादव ने अपनी मूल पार्टी से बगावत कर दिया था। लेकिन अधिक विधायकों का समर्थन होने की वजह से आयोग द्वारा इन्हे ही पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह मिला था।

पिछले साल अक्टूबर में हुए उपचुनाव के लिए आयोग ने उद्धव गुट को ‘शिवसेना-उद्धव बालासाहब ठाकरे’ और चिन्ह ‘जलती मशाल’ दिया था। जबकि शिंदे गुट को ‘बालासाहेबची शिवसेना’ और चिन्ह ‘तलवार-ढाल’ दिया था। चुनाव आयोग ने प्रदेश में विधानसभा उपचुनावों के पूरा होने तक उद्धव गुट को मशाल चुनाव चिन्ह इस्तेमाल की अनुमति दी है।

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